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आज बटि मचिगै पहाड़ में होलिकि धूम
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कालिका रावल
पिथौरगढ़। उसी तो देशभर में छरड़ी दिन एक दिनकि होली मनाई जांछि लेकिन अपणि विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान वाल पहाड़ में होलाष्टक बटि होलिकि धूम मचि जांछि। रंगभरणी एकादशी बटि पुर पहाड़ होलिकि रंग में सराबोर है जाल।
कुमाऊंक पहाड़ि इलाकन में होलाष्टक और रंगभरणी एकादशी बटि प्रतिप्रदा तक होली गायनकि धूम मचि जांछि। ये बार होलाष्टक 14 मार्च, रंगभरणी एकाद शी 17 मार्च और छरड़ि 21 मार्च छू। होलाष्टकाक दिन 17 मार्च खिन गंगोलीहाटाक हाट कालिका ज्यूक दरबार में चीर बंधन होलो। 17 मार्च रंगभरणी अकादशीक दिन पिथौरागढ़ मुख्यालय और जिल्लाक विभिन्न स्थानन में होलिक खालन में चीर बंधन होलो। खड़ी होलि गायनकि धूम मचि जालि। गौं, घर होलिकि मस्ती में डुबि जाल। गौंन में होलिक तैं अलग-अलग खाल (आंगन) हुनन। जां बटि होलिकि शुरुआत और समापन हुंछ।
दिन में होलिक दल घर-घर जाभेर होलि गायन करनान। ठाड़ी (खड़ी) होलिक गायन लयबद्ध तरीकलि हुंछ। कि बच्च, कि ज्वान, कि बुढ़ सब होलि में मगन रूनन। लोग अबीर, गुलाल, रंगलि रंगि रूनन। मंदिरन में भक्तिरसलि भरपूर होलि गाई जांछि। घर-आंगन में श्रृंगार रसलि लटपट होलि गाई जांछि।
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कुछ होलिनक बोल लोगनक दिन में बसी रूनन। सुमिरो सीता राम भया कोई हीरा जनम नहीं पाओगे। सबके के पिया होरी खेलें मन लागो छ, उत मेरो पिया परदेश कब आवेगो। घड़ा उठाई दे सिर पर रख दे, डगर बताई दे पनघट की। इन होली गीतनक साथ लोग 8-9 दिन तक सबकुछ भुलि भेर होलि में मगन रूनन। अपणि पहाड़ि बोलि, भाषाक विकास में लगातार जुटि रूनी आदलि कुशलि पत्रिकाकि संपादक डॉ. सरस्वती टम्टा ज्यू बतूनन कि प्राचीन समय में भगवान कृष्णनकि भूमि मथुरा बटि चीर पहाड़ में लाई गे। तब बटि पहाड़ में हर साल होलि उत्सवाक रूप में मनाई जांछि।
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पिथौरगढ़। उसी तो देशभर में छरड़ी दिन एक दिनकि होली मनाई जांछि लेकिन अपणि विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान वाल पहाड़ में होलाष्टक बटि होलिकि धूम मचि जांछि। रंगभरणी एकादशी बटि पुर पहाड़ होलिकि रंग में सराबोर है जाल।
कुमाऊंक पहाड़ि इलाकन में होलाष्टक और रंगभरणी एकादशी बटि प्रतिप्रदा तक होली गायनकि धूम मचि जांछि। ये बार होलाष्टक 14 मार्च, रंगभरणी एकाद शी 17 मार्च और छरड़ि 21 मार्च छू। होलाष्टकाक दिन 17 मार्च खिन गंगोलीहाटाक हाट कालिका ज्यूक दरबार में चीर बंधन होलो। 17 मार्च रंगभरणी अकादशीक दिन पिथौरागढ़ मुख्यालय और जिल्लाक विभिन्न स्थानन में होलिक खालन में चीर बंधन होलो। खड़ी होलि गायनकि धूम मचि जालि। गौं, घर होलिकि मस्ती में डुबि जाल। गौंन में होलिक तैं अलग-अलग खाल (आंगन) हुनन। जां बटि होलिकि शुरुआत और समापन हुंछ।
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दिन में होलिक दल घर-घर जाभेर होलि गायन करनान। ठाड़ी (खड़ी) होलिक गायन लयबद्ध तरीकलि हुंछ। कि बच्च, कि ज्वान, कि बुढ़ सब होलि में मगन रूनन। लोग अबीर, गुलाल, रंगलि रंगि रूनन। मंदिरन में भक्तिरसलि भरपूर होलि गाई जांछि। घर-आंगन में श्रृंगार रसलि लटपट होलि गाई जांछि।
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कुछ होलिनक बोल लोगनक दिन में बसी रूनन। सुमिरो सीता राम भया कोई हीरा जनम नहीं पाओगे। सबके के पिया होरी खेलें मन लागो छ, उत मेरो पिया परदेश कब आवेगो। घड़ा उठाई दे सिर पर रख दे, डगर बताई दे पनघट की। इन होली गीतनक साथ लोग 8-9 दिन तक सबकुछ भुलि भेर होलि में मगन रूनन। अपणि पहाड़ि बोलि, भाषाक विकास में लगातार जुटि रूनी आदलि कुशलि पत्रिकाकि संपादक डॉ. सरस्वती टम्टा ज्यू बतूनन कि प्राचीन समय में भगवान कृष्णनकि भूमि मथुरा बटि चीर पहाड़ में लाई गे। तब बटि पहाड़ में हर साल होलि उत्सवाक रूप में मनाई जांछि।