{"_id":"59aee10f4f1c1b65078b472f","slug":"151504633103-pithoragarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"लोककला की पीड़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लोककला की पीड़
Updated Tue, 05 Sep 2017 11:08 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
थल (पिथौरागढ़)। बलतिर गांव के 68 वर्षीय ढोलवादक मनोहर राम को इस बात का पश्चाताप है कि रोजीरोटी के लिए ढोल बजाने का काम क्यों चुना। सरकार ने न तो इस ढोल वादक को अब तक पेंशन ही दी और न मकान बनाने के लिए धनराशि ही उपलब्ध कराई। मनोहर राम ने 17 वर्ष की उम्र में अपने पिता मोहन राम से ढोल बजाने की कला सीखी थी। शुरुआत में तो यह काम काफी अच्छा लगा, लेकिन जब परिवार की जिम्मेदारी आई तो मनोहर राम को अन्य काम तलाशने पड़े। खाली समय में वह लोगों के खेतों में जुताई करने जाते हैं।
मनोहर राम ने बताया कि ढोल वादन का काम अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। पहाड़ पर अब बैंडबाजे वाले पहुंचने लगे हैं। लोगों को बैंडबाजे का स्वर ज्यादा पसंद है। वैसे भी पहाड़ के लोग अब विवाह के लिए किसी शहर के अच्छे बारातघर में चले जाते हैं। इस कारण भी उनको ढोल बजाने वालों की जरूरत नहीं होती। मनोहर राम का बड़ा बेटा दीवान राम प्राइवेट नौकरी करता है। छोटे बेटे प्रवीण राम को वह ढोल बजाने की कला सिखा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अब इस तरह के काम के प्रति कोई रुझान नहीं है। उनको इस बात की भी चिंता है कि आने वाले समय में यह कला लुप्त न हो जाए। उन्होंने कहा कि सरकार कलाकारों के बारे में कोरी घोषणा करती है। उसे व्यवहार में कभी नहीं लाया जाता। इसी विडंबना का शिकार सभी कलाकार हो रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मनोहर राम ने बताया कि ढोल वादन का काम अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। पहाड़ पर अब बैंडबाजे वाले पहुंचने लगे हैं। लोगों को बैंडबाजे का स्वर ज्यादा पसंद है। वैसे भी पहाड़ के लोग अब विवाह के लिए किसी शहर के अच्छे बारातघर में चले जाते हैं। इस कारण भी उनको ढोल बजाने वालों की जरूरत नहीं होती। मनोहर राम का बड़ा बेटा दीवान राम प्राइवेट नौकरी करता है। छोटे बेटे प्रवीण राम को वह ढोल बजाने की कला सिखा रहे हैं।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अब इस तरह के काम के प्रति कोई रुझान नहीं है। उनको इस बात की भी चिंता है कि आने वाले समय में यह कला लुप्त न हो जाए। उन्होंने कहा कि सरकार कलाकारों के बारे में कोरी घोषणा करती है। उसे व्यवहार में कभी नहीं लाया जाता। इसी विडंबना का शिकार सभी कलाकार हो रहे हैं।
विज्ञापन