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आठ दिवसीय राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में किए गए 200 शोधपत्र प्रस्तुत
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देवप्रयाग। रघुनाथ कीर्ति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में आयोजित आठ दिवसीय राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी में व्याकरण साहित्य, ज्योतिष व आधुनिक विषयों पर करीब 200 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। जबकि संस्थान की ओर से पहली बार पालि भाषा की ई-पत्रिका पालि संवाद व परिसर की त्रैमासिक पत्रिका श्री रघुनाथ वार्तावली की भी शुरुआत की गयी।
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आठ दिवसीय गोष्ठी का मंगलवार को समापन हो गया। इस मौके पर प्राचार्य प्रो. केबी सुब्बरायुडू ने कहा कि सेमीनार का उद्देश्य देश विदेश के विद्वानों के ज्ञान व शोधकार्यों को उत्तराखंड के जनमानस तक पहुंचाना है। संगोष्ठी के अंतिम सत्र में शोधार्थियों ने उत्तराखंड की लोक परंपरा, साहित्य व इतिहास से जुड़े कई शोधपत्र पढ़े, जिनमें पहाड़ो से पलायन को रोकने व प्राचीन धरोहरों को बचाने दिए गए। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के निदेशक प्रो. प्रेमचंद शास्त्री ने भारत के प्राचीन ग्रंथों का वैज्ञानिक उपयोग किए जाने की जानकारी दी है। गोष्ठी में पहुंचे राजकीय महाविद्यालय कोटद्वार के प्राचार्य प्रो. सोहनलाल भट्ट ने कहा कि विलुप्त होती लोक संस्कृति व संस्कृत को बचाने के उचित प्रयास होने चाहिए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रमुख पवन कुमार ने कहा कि जनमानस को संस्कृत भाषा के प्रति लगाव होना चाहिए। देव संस्कृति विवि के प्रो. नरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि शोध की नवीनता ही विषय को महत्वपूर्ण बनाती है। समापन कार्यक्रम में ई-पत्रिका के संपादक प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. वीरेंद्र बर्थवाल, डा. अरविंद गौर, डा. बालमुरगन, डा. मुकेश शर्मा ,डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. दिनेश पांडे, डा. अर्चना डिमरी, डा. प्रमोद थपलियाल, डा. अशोक जोशी, डा. धनेंद्र, विनोद पंडित, गार्गी नैनवाल, पंकज कोटियाल व अवधेश बिजल्वाण आदि मौजूद थे।
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राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आठ दिवसीय गोष्ठी का मंगलवार को समापन हो गया। इस मौके पर प्राचार्य प्रो. केबी सुब्बरायुडू ने कहा कि सेमीनार का उद्देश्य देश विदेश के विद्वानों के ज्ञान व शोधकार्यों को उत्तराखंड के जनमानस तक पहुंचाना है। संगोष्ठी के अंतिम सत्र में शोधार्थियों ने उत्तराखंड की लोक परंपरा, साहित्य व इतिहास से जुड़े कई शोधपत्र पढ़े, जिनमें पहाड़ो से पलायन को रोकने व प्राचीन धरोहरों को बचाने दिए गए। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के निदेशक प्रो. प्रेमचंद शास्त्री ने भारत के प्राचीन ग्रंथों का वैज्ञानिक उपयोग किए जाने की जानकारी दी है। गोष्ठी में पहुंचे राजकीय महाविद्यालय कोटद्वार के प्राचार्य प्रो. सोहनलाल भट्ट ने कहा कि विलुप्त होती लोक संस्कृति व संस्कृत को बचाने के उचित प्रयास होने चाहिए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रमुख पवन कुमार ने कहा कि जनमानस को संस्कृत भाषा के प्रति लगाव होना चाहिए। देव संस्कृति विवि के प्रो. नरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि शोध की नवीनता ही विषय को महत्वपूर्ण बनाती है। समापन कार्यक्रम में ई-पत्रिका के संपादक प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. वीरेंद्र बर्थवाल, डा. अरविंद गौर, डा. बालमुरगन, डा. मुकेश शर्मा ,डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. दिनेश पांडे, डा. अर्चना डिमरी, डा. प्रमोद थपलियाल, डा. अशोक जोशी, डा. धनेंद्र, विनोद पंडित, गार्गी नैनवाल, पंकज कोटियाल व अवधेश बिजल्वाण आदि मौजूद थे।
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