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नहीं मिली जरूरी सुविधाएं
अमर उजाला ब्यूरो, लालकुआं
Updated Wed, 30 Mar 2016 12:37 AM IST
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एक ओर जहां मंगल ग्रह पर जीवन यापन करने की कवायदें विज्ञान कर रहा है। वहीं इस अत्याधुनिक युग में ऐसे भी लोग हैं। जोौ 21 वीं सदी में भी बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। जी हां! यह कड़वी सच्चाई है। जनपद नैनीताल के सीमांत गांव बौड़खत्ता की।
इसी के आसपास बसे चार और खत्ते भी तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। खत्तों की बसासत में बौड़खत्ता का इतिहास काफी पुराना है। पुराने जानकार लोग इसकी बसासत सौ वर्ष पूर्व की बताते है। सन 1948 में यहां दुग्ध संघ द्वारा समिति का गठन किया गया था। पशुपालन व कृषि यहां के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। बसासत का एक शतक पूरा कर चुके यहां के वाश्ंिादे आज भी बेहद अभाव ग्रस्त जिंदगी जी रहे हैं।
बिजली आज तक यहां के लोगों को नसीब नहीं हुई है। कोई भी स्वास्थ्य केंद्र यहां के लिए अब भी एक सपना है। तीन सौ से लेकर चार सौ के बीच की आबादी वाला यह गांव तमाम झंझावतों का सामना कर रहा है। शिक्षा के नाम पर यहां एक मात्र प्राइमरी स्कूल है। वह भी जर्जर हालत में चल रहा है। इसी तरह झोपड़ पट्टी में ही आंगनबाड़ी केंद्र चल रहा है। यहां आज भी पक्के मकान नहीं बनाए जा सकते हैं।
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इस पर वन विभाग की पाबंदी है। अधिकांश ग्रामीण झोपड़ी में ही रहते हैं। खेती के एवज में उन्हें वन विभाग को चराई शुल्क अदा करना पड़ता है। हालांकि लोग बताते है कि पूर्व में डीएफओ के विद्यासागर द्वारा ग्रामीणों की दिक्कतों को देखते हुए सीमेंट अथवा टीन की चादर डालने की अनुमति दी गयी है। स्कूली बच्चों को पांचवीं से ऊपर की शिक्षा लेने के लिए करीब 4 किलोमीटर दूर संजय नगर बिंदुखत्ता जाना पड़ता है।
बरसातों में गौला नदी में बाढ़ आ जाने से उनकी पढ़ाई पर संकट मंडरा जाता है। ग्रामीण किसन सिंह रावत बताते हैं कि फसल अथवा जानवरों को नुकसान होने पर उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता है। ग्रामीण त्रिलोक सिंह बताते है कि अभावों में जिंदगी जीना यहां के लेागों की नियति बन गई है। ग्रामीणों के मुताबिक पूर्व मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट के प्रयासों से उन्हें सौर ऊर्जा उपलब्ध करायी गयी थी। मगर उनके अलावा किसी भी जनप्रतिनिधि ने उनके दर्द को समझने तक का प्रयास नहीं किया गया। बौड़खत्ते की तरह खमारी खत्ता, डौली खत्ता व रैक्वाल खत्ता भी हैं। जहां के हालात और भी बदतर हैं। ग्रामीणों की मांग है कि सभी खत्तों का एकीकरण कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
लालकुआं। उमा व हेमा बौड़खत्ते में गजब का आदर्श स्थापित कर रही हैं। इसमें एक आंगनबाड़ी केंद्र की कार्यकत्री हैं तो दूसरी सहायिका। 2014 में खुले आंगनबाड़ी केंद्र की व्यवस्थाएं देख रही उमा व हेमा अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। उनका मानना है कि कम से कम छोटे बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें सुनहरे भविष्य की ओर भेज सकते हैं।
इसी के आसपास बसे चार और खत्ते भी तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। खत्तों की बसासत में बौड़खत्ता का इतिहास काफी पुराना है। पुराने जानकार लोग इसकी बसासत सौ वर्ष पूर्व की बताते है। सन 1948 में यहां दुग्ध संघ द्वारा समिति का गठन किया गया था। पशुपालन व कृषि यहां के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। बसासत का एक शतक पूरा कर चुके यहां के वाश्ंिादे आज भी बेहद अभाव ग्रस्त जिंदगी जी रहे हैं।
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बिजली आज तक यहां के लोगों को नसीब नहीं हुई है। कोई भी स्वास्थ्य केंद्र यहां के लिए अब भी एक सपना है। तीन सौ से लेकर चार सौ के बीच की आबादी वाला यह गांव तमाम झंझावतों का सामना कर रहा है। शिक्षा के नाम पर यहां एक मात्र प्राइमरी स्कूल है। वह भी जर्जर हालत में चल रहा है। इसी तरह झोपड़ पट्टी में ही आंगनबाड़ी केंद्र चल रहा है। यहां आज भी पक्के मकान नहीं बनाए जा सकते हैं।
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इस पर वन विभाग की पाबंदी है। अधिकांश ग्रामीण झोपड़ी में ही रहते हैं। खेती के एवज में उन्हें वन विभाग को चराई शुल्क अदा करना पड़ता है। हालांकि लोग बताते है कि पूर्व में डीएफओ के विद्यासागर द्वारा ग्रामीणों की दिक्कतों को देखते हुए सीमेंट अथवा टीन की चादर डालने की अनुमति दी गयी है। स्कूली बच्चों को पांचवीं से ऊपर की शिक्षा लेने के लिए करीब 4 किलोमीटर दूर संजय नगर बिंदुखत्ता जाना पड़ता है।
बरसातों में गौला नदी में बाढ़ आ जाने से उनकी पढ़ाई पर संकट मंडरा जाता है। ग्रामीण किसन सिंह रावत बताते हैं कि फसल अथवा जानवरों को नुकसान होने पर उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता है। ग्रामीण त्रिलोक सिंह बताते है कि अभावों में जिंदगी जीना यहां के लेागों की नियति बन गई है। ग्रामीणों के मुताबिक पूर्व मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट के प्रयासों से उन्हें सौर ऊर्जा उपलब्ध करायी गयी थी। मगर उनके अलावा किसी भी जनप्रतिनिधि ने उनके दर्द को समझने तक का प्रयास नहीं किया गया। बौड़खत्ते की तरह खमारी खत्ता, डौली खत्ता व रैक्वाल खत्ता भी हैं। जहां के हालात और भी बदतर हैं। ग्रामीणों की मांग है कि सभी खत्तों का एकीकरण कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
लालकुआं। उमा व हेमा बौड़खत्ते में गजब का आदर्श स्थापित कर रही हैं। इसमें एक आंगनबाड़ी केंद्र की कार्यकत्री हैं तो दूसरी सहायिका। 2014 में खुले आंगनबाड़ी केंद्र की व्यवस्थाएं देख रही उमा व हेमा अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। उनका मानना है कि कम से कम छोटे बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें सुनहरे भविष्य की ओर भेज सकते हैं।