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मोदी जिसमें पास हुए, उसी परीक्षा में फेल हुए हरीश रावत

Sat, 11 Mar 2017 11:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल Updated Sat, 11 Mar 2017 11:47 PM IST
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Harish Rawat failed in the same examination where Modi passed
Modi 23 bate - फोटो : Self
 मतदाताआें की बजाय अपनी चुनावी रणनीति और प्रबंधन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना आखिरकार कांग्रेस को ले डूबा। कुमाऊं की 29 विधानसभाओं को एक साथ प्रभावित करने वाले मुद्दे के अभाव ने कांग्रेस की चुनौती को और बड़ा बना दिया। मतदाताओं का विश्वास अर्जित करने की जिस परीक्षा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में पास हुए , ठीक उसी परीक्षा में हरीश रावत फेल हो गए। मोदी ने रुद्रपुर में औद्योगिक निवेश और पिथौरागढ़ में केवल पूर्व सैनिकों की बात करके यह साफ कर दिया कि स्थानीय नब्ज को टटोलना भी जरूरी है। इसके उलट, अल्मोड़ा में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अल्मोड़ा में केवल नोटबंदी पर बोले और सितारगंज में भी राहुल का भाषण नोटबंदी पर ही केंद्रित रहा।
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चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में मोदी की पिथौरागढ़ और रुद्रपुर में हुई जनसभाओं से यह साबित हो गया था कि मोदी कुमाऊं को तो अपनी गिरफ्त में ले ही चुके हैं। शनिवार को नतीजे आने के बाद यह भी साफ हुआ कि मोदी का यह प्रभाव मतदान में भी काम कर गया। भाजपा के लिए यह किसी वरदान से कम साबित नहीं हुआ। इस पर भाजपा ने प्रदेश में चुनाव भी किसी चेहरे को प्रोजेक्ट करने की बजाय मोदी के  नाम पर ही लड़ा। यह जुमला भी सुनने को मिलता रहा कि मोदी की सरकार बनानी है।
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इस पर मोदी ने जिस तरह से मतदाताओं का विश्वास अर्जित किया, उसे कांग्रेस नकार गई। जिस परीक्षा में मोदी पास हुए, ठीक उसी परीक्षा में हरीश रावत कांग्रेस में उत्तराखंड के दिग्गज नेता होते हुए भी फेल हो गए। कांग्रेस को नोटबंदी में बैंकों के आगे खड़ी लाइन तो दिखाई दी पर हल्द्वानी में नाली में बहते हुए नोट नहीं दिखाई दिए। कांग्रेस नोटबंदी की परेशानी पर फोकस करके रह गई और मोदी पिथौरागढ़ में भी गरज कर कह गए कि उज्जवला के एक लाख गैस कनेक्शन में किसी को एक धेला भी नहीं देना पड़ा।
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ऐसे में कांग्रेस ने विधानसभा के स्तर पर चुनाव मैनेज करने की कोशिश की। पीके टीम की रणनीति भी यही रही और टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक में हरीश रावत की रणनीति भी। चूक यह हुई कि हरीश रावत ने इस पर भी जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। किच्छा पर और अधिक ध्यान न देने का अफसोस अब शायद हरीश रावत को सताएगा। 2009 के लोक सभा चुनाव में यही हरीश रावत थे जो हरिद्वार लोकसभा के चप्पे-चप्पे को रात दो बजे तक खंगाल रहे थे। मतदाताओं से सीधे जुड़ने की उनकी कोशिश पर यही रणनीति हावी रही। इसी रणनीति पर भरोसे का परिणाम था कि कांग्रेस मुस्लिम वोटों केन खिसकने को अपनी रणनीति का आधार बना बैठी। 
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