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फर्जी प्रमाणपत्रों से हथिया ली सरकारी नौकरी
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो/ भीमताल (नैनीताल)।
Updated Thu, 27 Aug 2015 01:30 AM IST
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रामनगर, रामगढ़ और ओखलकांडा ब्लाक के दूरस्थ क्षेत्रों में पांच शिक्षक पिछले 20-25 साल से शिक्षक कर रहे हैं। अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना में फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। इससे विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।
सूत्र बताते हैं कि सूचना आयोग देहरादून के निर्देश पर विभागीय अधिकारियों ने इन शिक्षकों की कुंडली खंगाली और उनके बीटीसी समेत अन्य प्रमाणपत्र जांच के लिए इलाहाबाद भेजे गए तो बीटीसी प्रमाणपत्र फर्जी निकले।
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बीटीसी के फर्जी प्रमाणपत्रों के माध्यम से बेखौफ होकर नौकरी कर रहे पांचों शिक्षक कोई नए नहीं हैं। इनमें शामिल राउप्रावि सांवल्दे पश्चिम रामनगर के सहायक अध्यापक राजेंद्र सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1990 का, राप्रावि काकड़ीघाट रामगढ़ के सहायक अध्यापक हरपाल सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1988 का, ओखलकांडा के राप्रावि टांडा के प्रधानाध्यापक रोहिताश सिंह का वर्ष 1988 का, ओखलकांडा के चमोली गांजा में तैनात सहायक अध्यापक धर्मवीर सिंह का वर्ष 1987 का और ओखलकांडा के ककोड़ गाजा में कार्यरत रामकुमार सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1991 का है।
यानी उक्त पांचों शिक्षकों को विभाग में फर्जी प्रमाणपत्र के माध्यम से नौकरी करते हुए दो से ढाई दशक हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नियुक्ति के दौरान इन शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच नहीं की गई होगी? यदि नहीं तो फिर क्यों और इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं?
शिक्षा विभाग में फर्जी प्रमाणपत्रों से नौकरी के मामले के खुलासे के बाद महकमे में ही इस बात की खुलेआम चर्चा है कि यदि अलग राज्य बनने से पहले विभाग में नियुक्त समस्त शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच की जाए तो अभी कई और ऐसे चहरे बेनकाब हो जाएंगे, जो फर्जी डिग्रियों से बेखोफ होकर नौकरी कर रहे हैं। यही नहीं इस बात की भी चर्चा है कि इसमें शिक्षकों के अलावा कई अधिकारी स्तर के चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं।
मुख्य शिक्षा अधिकारी रघुनाथ लाल आर्य कहते हैं कि मामले में उच्चाधिकारियों ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की है।
कमेटी के समक्ष संबंधित शिक्षकों को अपने मूल प्रमाणपत्र और डिग्री प्रस्तुत करनी होगी यदि नहीं कर पाए तो संबंधित शिक्षकों के खिलाफ अग्रिम कार्रवाई होगी और अब तक लिया गया वेतन की भी रिकवरी कराई जाएगी।
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कुछ समय पहले सिविल लाइंस मुरादाबाद निवासी एक अधिवक्ता अख्तर हसनैन रिजवी ने आरटीआई के माध्यम से नैनीताल जिले के विभिन्न विकासखंडों में कार्यरत आधा दर्जन शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की सत्यता के बारे में जानकारी मांगी थी।
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सूत्र बताते हैं कि सूचना आयोग देहरादून के निर्देश पर विभागीय अधिकारियों ने इन शिक्षकों की कुंडली खंगाली और उनके बीटीसी समेत अन्य प्रमाणपत्र जांच के लिए इलाहाबाद भेजे गए तो बीटीसी प्रमाणपत्र फर्जी निकले।
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बीटीसी के फर्जी प्रमाणपत्रों के माध्यम से बेखौफ होकर नौकरी कर रहे पांचों शिक्षक कोई नए नहीं हैं। इनमें शामिल राउप्रावि सांवल्दे पश्चिम रामनगर के सहायक अध्यापक राजेंद्र सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1990 का, राप्रावि काकड़ीघाट रामगढ़ के सहायक अध्यापक हरपाल सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1988 का, ओखलकांडा के राप्रावि टांडा के प्रधानाध्यापक रोहिताश सिंह का वर्ष 1988 का, ओखलकांडा के चमोली गांजा में तैनात सहायक अध्यापक धर्मवीर सिंह का वर्ष 1987 का और ओखलकांडा के ककोड़ गाजा में कार्यरत रामकुमार सिंह का बीटीसी प्रमाणपत्र वर्ष 1991 का है।
यानी उक्त पांचों शिक्षकों को विभाग में फर्जी प्रमाणपत्र के माध्यम से नौकरी करते हुए दो से ढाई दशक हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नियुक्ति के दौरान इन शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच नहीं की गई होगी? यदि नहीं तो फिर क्यों और इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं?
शिक्षा विभाग में फर्जी प्रमाणपत्रों से नौकरी के मामले के खुलासे के बाद महकमे में ही इस बात की खुलेआम चर्चा है कि यदि अलग राज्य बनने से पहले विभाग में नियुक्त समस्त शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच की जाए तो अभी कई और ऐसे चहरे बेनकाब हो जाएंगे, जो फर्जी डिग्रियों से बेखोफ होकर नौकरी कर रहे हैं। यही नहीं इस बात की भी चर्चा है कि इसमें शिक्षकों के अलावा कई अधिकारी स्तर के चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं।
मुख्य शिक्षा अधिकारी रघुनाथ लाल आर्य कहते हैं कि मामले में उच्चाधिकारियों ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की है।
कमेटी के समक्ष संबंधित शिक्षकों को अपने मूल प्रमाणपत्र और डिग्री प्रस्तुत करनी होगी यदि नहीं कर पाए तो संबंधित शिक्षकों के खिलाफ अग्रिम कार्रवाई होगी और अब तक लिया गया वेतन की भी रिकवरी कराई जाएगी।