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गोरी घाटी के काले बंदर का इतिहास होगा सार्वजनिक
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कोको रोसे, डीएफओ।
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। मुनस्यारी क्षेत्र की गोरी घाटी में पाए जाने वाले काले बंदर का इतिहास शीघ्र सार्वजनिक होगा। वन विभाग की टीम क्षेत्र में जाकर काले बंदरों की गतिविधियों पर नजर रख विस्तृत जानकारी जुटाएगी। जानकारी के मुताबिक यहां के अलावा काला बंदर देश के अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं पाया जाता है। हालांकि यह बंदर असम में मिलने वाले मकाऊ बंदर की तरह बताया जाता है लेकिन बिना डीएनए जांच के ऐसी कोई पुष्टि नहीं की जा सकती है। इसी कारण इनका वैज्ञानिक नाम भी नहीं रखा गया है।
गोरी घाटी में पाए जाने वाले ये काले बंदर बेहद शांत स्वभाव के होते हैं। इनके बारे में लोग बेहद कम ही जानते हैं। इनका इतिहास जानने के लिए पूर्व में दो-तीन बार अध्ययन किया जा चुका है लेकिन इनके बारे में ज्यादा पता नहीं चल पाया।
आईएफएस अधिकारी अभिमन्यु ने बताया कि स्थानीय लोग इसे काला बंदर कहते हैं। इनका रंग हल्का काला, जबकि अधिक काला होता है। उन्होंने बताया कि ये बंदर 10 से 20 के झुंड में ही दिखाई देते हैं, जो अक्सर अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य के बरम क्षेत्र में 900 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर रहते हैं। कभी कभार ये 2750 मीटर की ऊंचाई वाले कालामुनि के पास भी दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया कि हिमालयन मकाऊ अभी एक पहेली की तरह है। पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि यह असम में मिलने वाले बंदरों की उप प्रजाति है। ये बंदर दुनिया के लिए नए भी हो सकते हैं। फिलहाल इन पर अधिक अध्ययन किया जाना बाकी है।
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नर का चेहरा अधिक काला
पिथौरागढ़। डीएफओ अभिमन्यु ने बताया कि काले नर बंदर का चेहरा अधिक काला होता है जबकि उसकी आंखों के पास चश्मे जैसा सफेद रंग होता है। मादा बंदर का चेहरा लाल रंग का होता है। ये बंदर खड़ी चट्टानों में रहना पसंद करते हैं, जो च्यूरा के पके फलों को बड़े चाव से खाते हैं। ये बंदर जब चलते हैं तो इनकी पीठ पर कूबड़ दिखाई देता है, जबकि पूंछ कभी नहीं गिरती। कान नुकीले और बाल रहित होते हैं। पलकें सफेद रंग की होती हैं।
काला बंदर सिर्फ गोरी घाटी में पाया जाता है। बंदरों की संख्या और उनके पारिस्थितिकी तंत्र की जानकारी ली जाएगी। इसके लिए एक टीम क्षेत्र में भेजी जाएगी, जो कुछ दिन वहां रहकर काले बंदरों पर अध्ययन करेगी। इसके बाद बंदर की जानकारी साझा की जाएगी। वन्यजीव संस्थान देहरादून से भी इनके अध्ययन के लिए बात की जाएगी। - कोको रोसे, डीएफओ, पिथौरागढ़।
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गोरी घाटी में पाए जाने वाले ये काले बंदर बेहद शांत स्वभाव के होते हैं। इनके बारे में लोग बेहद कम ही जानते हैं। इनका इतिहास जानने के लिए पूर्व में दो-तीन बार अध्ययन किया जा चुका है लेकिन इनके बारे में ज्यादा पता नहीं चल पाया।
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आईएफएस अधिकारी अभिमन्यु ने बताया कि स्थानीय लोग इसे काला बंदर कहते हैं। इनका रंग हल्का काला, जबकि अधिक काला होता है। उन्होंने बताया कि ये बंदर 10 से 20 के झुंड में ही दिखाई देते हैं, जो अक्सर अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य के बरम क्षेत्र में 900 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर रहते हैं। कभी कभार ये 2750 मीटर की ऊंचाई वाले कालामुनि के पास भी दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया कि हिमालयन मकाऊ अभी एक पहेली की तरह है। पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि यह असम में मिलने वाले बंदरों की उप प्रजाति है। ये बंदर दुनिया के लिए नए भी हो सकते हैं। फिलहाल इन पर अधिक अध्ययन किया जाना बाकी है।
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नर का चेहरा अधिक काला
पिथौरागढ़। डीएफओ अभिमन्यु ने बताया कि काले नर बंदर का चेहरा अधिक काला होता है जबकि उसकी आंखों के पास चश्मे जैसा सफेद रंग होता है। मादा बंदर का चेहरा लाल रंग का होता है। ये बंदर खड़ी चट्टानों में रहना पसंद करते हैं, जो च्यूरा के पके फलों को बड़े चाव से खाते हैं। ये बंदर जब चलते हैं तो इनकी पीठ पर कूबड़ दिखाई देता है, जबकि पूंछ कभी नहीं गिरती। कान नुकीले और बाल रहित होते हैं। पलकें सफेद रंग की होती हैं।
काला बंदर सिर्फ गोरी घाटी में पाया जाता है। बंदरों की संख्या और उनके पारिस्थितिकी तंत्र की जानकारी ली जाएगी। इसके लिए एक टीम क्षेत्र में भेजी जाएगी, जो कुछ दिन वहां रहकर काले बंदरों पर अध्ययन करेगी। इसके बाद बंदर की जानकारी साझा की जाएगी। वन्यजीव संस्थान देहरादून से भी इनके अध्ययन के लिए बात की जाएगी। - कोको रोसे, डीएफओ, पिथौरागढ़।