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हाईकोर्ट ने नदियों पर लगाई 'लगाम'
अमर उजाला, नैनीताल
Updated Tue, 27 Aug 2013 08:55 AM IST
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हाईकोर्ट ने उत्तराखंड की समस्त नदियों से 200 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी है। अदालत ने नोटिस जारी करते हुए जनता से कहा है कि वह चाहे तो अपना पक्ष रख सकती है।
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मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। ऋषिकेश निवासी संजय व्यास ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर वर्ष 2000 के उस शासनादेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत मंदिर, धर्मशाला और मठ आदि का निर्माण 200 मीटर के भीतर करने की अनुमति दी गई है।
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याचिका में आरोप लगाया गया कि सरकार ने मंदिर, मठ आदि के निर्माण की अनुमति तो दे दी, लेकिन आम नागरिक को उसकी संपत्ति पर निर्माण और मरम्मत करने से रोका जा रहा है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश की समस्त नदियों से 200 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी है।
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साथ ही न्यायालय ने आम जनता को नोटिस जारी करते हुए कहा कि वह चाहे तो अपना पक्ष रख सकती है।
ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी पूर्ण प्रतिबंध को कहा
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, प्रदेश सरकार, सीमा सड़क संगठन और अन्य संबंधित पक्षों को जमकर फटकारा। ट्रिब्यूनल ने सोमवार को साफ-साफ कहा कि खूबसूरत प्रदेश उत्तराखंड के पर्यावरण को लेकर संबंधित पक्ष अपने संवैधानिक और विधिक दायित्व को पूरा करने में विफल रहा है।
एनजीटी चेयरपर्सन न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों के जवाब पर असंतोष जाहिर किया। पीठ ने कहा कि किसी भी पक्ष ने पूरी तरह से तथ्यों को सामने नहीं रखा है। वे यह भी बताने में असफल रहे हैं कि 16-17 जून की आपदा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के अगस्त माह के दिए गए निर्देशों को लागू किया जा सका है या नहीं। ट्रिब्यूनल के दो जुलाई के आदेश को लेकर दाखिल शपथ पत्र भी अधूरा है।
ट्रिब्यूनल ने संबंधित पक्षों से प्रदेश में बहने वाली नदियों और सहायक नदियों के किनारों पर पूरी तरह से निर्माण पर रोक लगाने का भी आदेश दिया। इसके साथ ही गंगोत्री इको सेंसिटिव जोन में भी भागीरथी किनारे निर्माण पर पूरी तरह से रोक लगाने को कहा है।
अधिवक्ता संजय उपाध्याय ने इस मामले में तीन जुलाई को याचिका दाखिल कर कहा था कि 16-17 जून को आई आपदा बहुत हद तक मानव जनित भी है। केदारनाथ और नदियों के किनारे निर्माण कार्य को जारी रहने दिया गया। इस कारण आपदा से नुकसान बहुत बढ़ गया था।
प्रदेश सरकार द्वारा की गई कोशिश
- सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद सरकार भी हरकत में आई थी। कैबिनेट ने जुलाई में पुनर्वास प्राधिकरण पर फैसला करते हुए यह तय किया था कि नदियों के किनारे निर्माण कार्य नहीं किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के तहत 200 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
- हाल ही में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा था कि नदियों के किनारे वाली सड़कें रीअलाइन की जाएंगी। नदियों के किनारे सड़क होने से बसावट भी नदी के किनारे हो रही है। दूसरी ओर नदियों में बाढ़ आने पर सड़कों को भी नुकसान होता है। इसके साथ ही यात्रियों की संख्या को सीमित करने का इरादा भी जताया गया था। हालांकि यह किस तरह से होगा इसकी व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है।
- प्रदेश की अधिकतर नदियों पर जल विद्युत परियोजनाएं या तो निर्माणाधीन हैं या फिर प्रस्तावित। इन परियोजनाओं पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है। चार धाम यात्रा मार्ग भी नदियों के किनारे ही है और इन मार्गों पर पड़ने वाले पड़ावों में अधिकतर पर नदियों में अतिक्रमण की शिकायत भी है।
यही कारण रहा कि नदियों में आने वाली बाढ़ से खासा नुकसान हुआ। केदारनाथ में जरूरत से ज्यादा निर्माण की शिकायत भी पहले आई थी और एक बार प्रशासन ने बाकायदा अतिक्रमण हटाओ अभियान भी चलाया था, पर दबाव में यह अभियान रुक गया था।
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