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बांधों से नहीं, बनाने की विधि से हुई तबाही

Sat, 13 Jul 2013 08:22 AM IST
राजीव पांडे
राजीव पांडे Updated Sat, 13 Jul 2013 08:22 AM IST
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method of making dams creates destruction

केदारनाथ की आपदा को लेकर अब तक जितने भी तथ्य सामने आए हैं उसके लिए हिमालय की कमजोर पर्वत श्रृंखला और यहां हो रहे निर्माण को दोषी बताया गया है।

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नदियों में हो रहे खनन और पेड़ों के कटान पर विशेषज्ञों ने आपदा की जिम्मेदारी डाली है, जबकि जेएनयू में सेंटर फॉर साइंस पालिसी के चेयरमैन रह चुके और हिमालय पर कई किताबें लिखने वाले वैज्ञानिक धीरेंद्र शर्मा इन बातों से इत्तफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि जहां से आपदा आ रही है वह 10 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर हैं।
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ऐसी जगहों पर न पेड़ हैं न निर्माण। बाढ़ को रोकने के लिए वह नदियों में खनन को जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि बड़े बांधों से नहीं इसको बनाने की गलत विधि के कारण जरूर पहाड़ों को काफी नुकसान हुआ है।

ब्लास्टिंग को लेकर उठा सवाल
16 जून को केदारनाथ में आई आपदा के जख्म अभी सूखे नहीं हैं। कितने मरे? कितने लापता? यह सवाल पूरे देश के सामने खड़े हैं। क्यों आई आपदा? इससे भविष्य में कैसे बचें? इन तमाम सवालों के जवाब भूगर्भविद् और वैज्ञानिक दे रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल पहाड़ों पर हो रही ब्लास्टिंग को लेकर उठा है। प्रोफेसर शर्मा भी इसके खिलाफ हैं। वह इस विधि से काम करवा रहे लोगों के लिए फांसी की सजा की मांग करते हैं।


उनका कहना है कि पिछले सालों में वैज्ञानिकों ने अध्ययन कर ऐसी-ऐसी विधियां ईजाद की हैं, जिनसे निर्माण के लिए पहाड़ों पर विस्फोट करने की आवश्यकता नहीं। इसे ड्रिलिंग विधि कहते हैं। इस विधि से टनल बनाई जाए तो कहीं कोई नुकसान नहीं होता। जापान में इसी विधि से काम हो रहा है, जबकि अन्य मामलों में उनकी राय अन्य विशेषज्ञों से जुदा है।

वह हिमालय को कमजोर पर्वत श्रृंखला नहीं अन्नदाता, जलदाता और बिजली दाता मानते हैं। जहां पांच हजार से अधिक ग्लेशियर हैं। इनके टूटने से आपदा आ रही है और ऐसे इलाकों में न कोई पेड़ हैं और न निर्माण। उनका कहना है कि इस पीड़ा से अकेले उत्तराखंड नहीं पूरी दुनिया जूझ रही है। यह ग्लोबल समस्या है। पिछले महीने कनाडा, अमेरिका और यूरोपीय देशों में आई बाढ़ इसका उदाहरण है।

होने देते हैं बेहिसाब अवैज्ञानिक खनन
नदियों में खनन बंद करने की बात को भी प्रोफेसर शर्मा बचकाना मांग कहते हैं। उनका कहना है कि नदियों में बाढ़ रोकनी है तो इन्हें वैज्ञानिक तरीके से 18 से 20 फीट तक खोदा जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा क्योंकि उत्तराखंड की सत्ता पर बैठे लोग हमेशा से इस बाढ़ के नाम केंद्र से हजारों करोड़ रुपए आपदा पर मांगते रहे हैं और बेहिसाब अवैज्ञानिक खनन होने देते हैं।

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