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अब इनके सिर पर मंडरा रहा खतरा
गढ़वाल/ब्यूरो
Updated Tue, 30 Jul 2013 10:41 AM IST
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उत्तराखंड की हालिया आपदा ने देश-विदेश का ध्यान खींचा तो राज्य सरकार भी थोड़ी सक्रिय हुई। लेकिन गढ़वाल के कई गांव आपदा की मार से अरसे से जूझ रहे हैं। कई बरसों से विस्थापन की बाट जोह रहे हैं। कुछ का इंतजार नौ साल का है तो कुछ का तीन वर्ष का।
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ऐसे गांवों की संख्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। लेकिन सरकार, शासन-प्रशासन से इन्हें उपेक्षा ही मिल रही है। सवाल यही है कि क्या इस बार की आपदा से सरकार कोई सबक सीखेगी और जिन गांवों के लोगों पर खतरे की तलवार मंडरा रही है उनके विस्थापन की दिशा में कदम उठाए जाएंगे?
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नौ साल से विस्थापन का इंतजार कर रहा द्वींग गांव
हालात की बेबसी देखिए। किमाणा घाटी के द्वींग गांव के लोग कसमसा रहे हैं। उनके मकान गिरने के कगार पर हैं। शासन-प्रशासन से विस्थापन की आस लगाए हैं। वर्ष 2004 में आई आपदा में भी यह पूरी घाटी प्रभावित हुई थी, जिसके बाद द्वींग गांव को विस्थापन की सूची में रखा गया था। लेकिन नौ साल बाद भी गांव का विस्थापन नहीं हो पाया है।
लगातार हो रही बारिश से द्वींग गांव के 41 परिवार खौफ के साये में जीवन यापन कर रहे हैं। ग्राम प्रधान द्वींग-तपोंण भरत सिंह झिंक्वाण का कहना है कि 2004 में आई आपदा के बाद प्रशासन द्वारा विस्थापन के लिए अनुबंध किया गया था, जिसके अनुसार प्रशासन द्वारा ग्रामीणों की नाप भूमि पर ही विस्थापन करवाया जाना था। लेकिन इस ओर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।
ग्रामीण हयात सिंह, आनंद सिंह कुंवर का कहना है कि दरकते गांव में रहना पल-पल भारी लग रहा है। नौ साल में कई बार जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों ने गांव का स्थलीय निरीक्षण किया, लेकिन स्थिति जस की तस बनी है। इधर, तहसीलदार एमएस भंडारी का कहना है कि कि प्रखंड के 29 गांवों को विस्थापन के लिए सूचीबद्ध किया गया है। शासन से निर्देश मिलने के बाद गांवों का विस्थापित किया जाएगा।
छिनका में हो रहे भूस्खलन से ग्रामीण दहशत में
दशोली प्रखंड के ग्राम सभा छिनका के चमेली, तलियांण, बम्पाल धार और प्राथमिक विद्यालय के पास भूस्खलन होने से ग्रामीण दहशत में हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम पंचायत के चार तोकों के 158 परिवारों को वर्ष 2010 से विस्थापन की सूची में रखा गया है, लेकिन अभी तक ग्रामीणों के विस्थापन के लिए शासन-प्रशासन द्वारा कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए हैं।
ग्रामीण दर्शन सिंह, हुकम सिंह कुंवर, रूपा देवी, कलावती फोनिया का कहना है कि गांव के चारों तोक तीन साल से विस्थापन की सूची में हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी है। पिछले साल आई आपदा में प्रशासन द्वारा टेंट दिए गए थे, जो अब फट चुके हैं।
ग्राम प्रधान छिनका सर्वेश्वर प्रसाद सती का कहना है कि वर्ष 2010 में आई आपदा के बाद से गांव के 158 परिवार विस्थापन की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन शासन-प्रशासन द्वारा तीन साल बीतने पर भी विस्थापन को लेकर कोई सकारात्मक पहल नहीं हो पाई है।
छिनका के प्रभावित ग्रामीणों के विस्थापन के लिए देवर-खडोरा गांव में भूमि चयनित की गई थी, लेकिन देवर-खडोरा के ग्रामीणों की आपत्ति के बाद विस्थापन नहीं हो पाया है। अब अन्यत्र भूमि चयनित कर शीघ्र प्रभावितों का विस्थापन किया जाएगा।
-अवधेश कुमार सिंह, उपजिलाधिकारी चमोली
घर बने डेंजर जोन, टेंटों का लिया सहारा
ऊखीमठ तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत दिलमी के चाखुल तोक में भूस्खलन से दिलमी गांव को खतरा पैदा हो गया है। भूस्खलन से चाखुल में दो आवासीय भवनों को भी क्षति पहुंची है। प्रभावित परिवार घर को छोड़कर टेंट में रह रहे हैं। सोमवार को प्रशासन की टीम ने गांव का निरीक्षण किया।
प्रभावित रामेश्वर प्रसाद नौटियाल ने बताया कि भूस्खलन के कारण घर में दरारें पड़ गई हैं। हल्की बारिश होने पर भी भवन गिरने का डर बना हुआ है, जिस कारण तोक से आधा किलोमीटर दूर खेतों में टेंट लगाकर रह रहे हैं। भूस्खलन से बच्ची राम नौटियाल के घर का आंगन भी क्षतिग्रस्त हो गया है। ग्राम प्रधान गुड्डी देवी की सूचना पर प्रशासन की टीम ने गांव का निरीक्षण किया।
भू-धंसाव से ग्रामीण दहशत में
वहीं कालीमठ घाटी के अंतर्गत कविल्ठा में भी भू-धंसाव से ग्रामीण दहशत में हैं। पूर्व जिला पंचायत सदस्य मनवर सिंह चौहान और क्षेत्र पंचायत सदस्य उर्मिला देवी ने बताया कि कविल्ठा में लगातार भूधंसाव से घरों में दरारें पड़ने लगी हैं। 25 जुलाई को जांच टीम सर्वे करने को तो आई लेकिन गांव नहीं पहुंची। उन्होंने डीएम को ज्ञापन प्रेषित कर गांव का सर्वेक्षण कर ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की मांग की है।
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