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पहाड़ की लोक संस्कृति और लोगों के दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे रामरतन काला

Thu, 20 May 2021 10:25 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Thu, 20 May 2021 10:25 PM IST
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Ramratan Kala will always be alive in the heart of the folk culture and people of the mountain
जीवन पर्यंत पहाड़ की लोक संस्कृति के लिए समर्पित रहे रामरतन काला ने बीमारी के कारण कई साल पहले ही रंगमंच को अलविदा कह दिया था, लेकिन लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन को लेकर वे जीवन के आखिरी दिनों तक चिंतित रहे। पहाड़ की लोक संस्कृति और लोगों के दिलों में वे हमेशा जिंदा रहेंगे।
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लोक कलाकार महासंघ के अध्यक्ष बृजेंद्र चौधरी और महासचिव ओमप्रकाश कपटियाल बताते हैं कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए वह हमेशा से गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों के रंगकर्मी, संस्कृति कर्मियो से एक मंच पर आकर इसे देश और दुनिया तक फैलाने की बात करते रहे। रामरतन काला के आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र से प्रसारित लोकगीतों ने खूब धूम मचाई। वह गढ़वाल और कुमाऊं में समान रूप से सुने जाते रहे। राज्य गठन के बाद विभिन्न गढ़वाली एलबमों में अभिनय करने वाले रामरतन काला के रंगमंच का सफर 1985 से शुरू हुआ। वे पहली बार लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ मुंबई पहुंचे। वहां उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम में शानदार प्रस्तुति दी। तब से शुरू हुआ अभिनय का यह सिलसिला कुछ वर्ष पूर्व तक बदस्तूर जारी रहा। कुछ साल पहले बीमारी के कारण उन्हें रंगमंच की दुनिया को छोड़ना पड़ा, लेकिन पहाड़ की संस्कृति को लेकर उनका चिंतन जारी रहा। ‘नया जमना का छौरों कन उठि बौल, तिबरी-घंडिल्यूं मा रौक एण्ड रोल..’, ‘तेरो मछोई गाड बोगिगे, ले खाले अब खा माछा...’, ‘समद्यौला का द्वी दिन समलौणा ह्वैगीनि...’ सहित कई गीतों में रामरतन काला ने अपने अभिनय की छाप छोड़ी। रामरतन काला ने स्यांणी, नौछमी नारेणा, सुर्मा सरेला, हल्दी हाथ, तेरी जग्वाल, बसंत अगे जैसी कई वीडियो एलबमों में अपने अभिनय से दर्शकों में छाप छोड़ी। बीते चार पांच साल से वह पदमपुर सुखरो में जीत सिंह रावत की चक्की के सामने कुर्सी पर बैठे दिखाई देते थे। आते जाते अभिवादन के दौरान वह कहते थे कि रंगमंच के जुनून ने उन्हें हमेशा पहाड़ से जोड़े रखा। वे रहते भले ही कोटद्वार में हैं, लेकिन उनकी आत्मा पहाड़ों में बसती है। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ ही लोक कलाकार विजेंद्र चौधरी, ओमप्रकाश कबटियाल, सुमित्रा रावत, जीतेंद्र चौहान, संजय रावत, सुधीर बहुगुणा सहित कई अन्य कलाकारों ने उनके निधन पर गहरा दु:ख प्रकट किया है। संवाद
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