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लाहौर जीतकर एक आदेश के आगे हार गए ब्रिगेडियर हेड
सुनील शाह/अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Thu, 26 Sep 2013 01:13 AM IST
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हम लोग उन्हें कर्नल हेड के नाम से ही बुलाते थे। कर्नल हेड, बैरिस्टर मुकुंदीलाल के दामाद थे और आयरिश मूल के थे।
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आजादी के बाद उन्होंने आयरलैंड लौटने की जगह भारतीय सेना में ही बने रहना ठीक समझा और यहीं रुक गए।
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नैनीताल में हमारे पारिवारिक बैंक दुर्गा साह-मोहनलाल साह बैंक में मेरे पिता स्व. कुंदन लाल साह ने उनसे मेरी भेंट यह कहकर कराई थी कि ये कर्नल हेड हैं जिन्होंने 65 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना का सफाया कर दिया था।
वह गोरे थे और उनके बाल हल्के भूरे
इस बैंक में उनका संभवत: खाता था या मेरे कका मदन लाल साह के मित्र होने के नाते उनसे मिलने आए थे। वह गोरे थे और उनके बाल हल्के भूरे थे।
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इससे आगे की कहानी पिताजी के आग्रह पर कर्नल साहब ने खुद सुनाई। ‘हमारी सेनाएं लाहौर के दरवाजे तक पहुंच गई थीं बस एक आदेश का इंतजार था और लाहौर हमारा होता’।
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दूतावास खाली कराने शुरू कर दिए
कर्नल डेस्मेंड हेड से युद्ध का वह विवरण सुनकर मुझे रोमांच हो उठा था। उन्होंने बताया ‘साह साहब (मेरे पिता) लाहौर पर भारतीय कब्जे के अंदेशे से तमाम देशों ने अपने दूतावास खाली कराने शुरू कर दिए थे।’
मुझे साफ याद है उन्होंने कहा था अमेरिका ने जब अपना दूतावास खाली कराया तो हम से अनुमति ली, क्योंकि हमारी अनुमति के बिना कोई भी हवाई जहाज लाहौर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से नहीं उड़ सकता था।
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सेना की विजय यात्रा पर राजनीतिक विराम
इससे आगे की कहानी सब को पता है। ताशकंद समझौता कराके पाकिस्तान बच गया और हमारी सेनाओं को लाहौर के दरवाजे से लौटना पड़ा।
यह वृतांत मुझे आज भी याद है और शायद हमेशा रहेगा उस मलाल के साथ जो कर्नल हेड के चेहरे पर उस दिन मुझे दिखा था। भारतीय सेना की विजय यात्रा पर राजनीतिक विराम और एक नासूर को बड़े होने देने का मलाल।