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गुमनामी का दंश झेल रहा 'ऑलराउंडर' ओलंपियन
अमर उजाला, राकेश शर्मा, हल्द्वानी
Updated Mon, 02 Sep 2013 05:39 PM IST
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अपने हुनर और कौशल से देवभूमि उत्तराखंड का सिर ऊंचा करने वाले खिलाड़ियों को गुमनामी के अलावा कुछ नहीं मिलता। 1954 से 1959 तक हॉकी और फुटबॉल के नेशनल चैंपियन रहे श्रीकृष्ण चंद्र जोशी भी इसी दर्द के शिकार हैं।
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79 वर्षीय श्रीकृष्ण वर्षों से काठगोदाम में अपने परिवार के साथ रहकर गुमनामी का जीवन जी रहे हैं। उनके मन में टीस इस बात की है कि उत्तराखंड में खेल उपेक्षित हैं और देवभूमि के होनहार खिलाड़ियों को सम्मान नहीं मिलता।
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साथियों को देख जगी इच्छा
श्रीकृष्ण के पिता स्व. ज्वाला दत्त जोशी मूल रूप से द्वाराहाट (अल्मोड़ा) के गांव तल्ली मिरई के रहने वाले थे। वह किंग जॉर्जिस रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज अजमेर में हिंदी के प्रोफेसर रहे।
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श्रीकृष्ण ने बताया कि इंडियन मिलिट्री कालेज के कैंपस में छात्रों को हॉकी और फुटबॉल खेलते देख उनके मन में भी हॉकी और फुटबॉल खेलने की इच्छा जगी।
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1956 ओलंपिक में लिया हिस्सा
बाद में उन्हें राजपूताना स्कूल हॉकी टीम और राजस्थान स्कूल हॉकी टीम में स्थान मिला। 1954 में ऑल इंडिया स्कूल हॉकी टूर्नामेंट के पूना कैंप में भाग लिया। तब इंडियन हॉकी फेडरेशन ने आमंत्रित किया था।
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श्रीकृष्ण बताते हैं कि 1956 में ओलंपिक टीम में चयन हुआ। हॉकी टूर्नामेंट ऑफ इंडिया, ध्यानचंद हॉकी टूर्नामेंट दिल्ली, गोल्ड कप हॉकी टूर्नामेंट बांबे के बाद जोधपुर में हुई फुटबॉल की संतोष ट्रॉफी में भी प्रतिभाग किया।
नामचीन कंपनियों में ठुकराए नौकरी के ऑफर
उन्होंने स्वर्ण, रजत समेत कई नेशनल ट्राफियां जीतीं। श्रीकृष्ण ने पुलिस, आर्मी, रेलवे और टाटा समेत कई अन्य नामचीन कंपनियों में नौकरी के ऑफर ठुकराए थे।
इनमें रहे नेशनल चैंपियन
नेशनल हॉकी चैंपियनशिप जालंधर (1956), बांबे (1957 और 1958), हैदराबाद (1959) और आल इंडिया ट्रेड हॉकी टूर्नामेंट नैनीताल में 1955 से 1957 तक और वेस्टर्न रेलवे सीनियर डिजीवन हॉकी लीग बांबे में प्रतिभाग किया। वहीं, फुटबॉलमें नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप अरनाकुलाम (1955) और त्रिवंद्रम केरल (1956) में चैंपियन रहे।
दद्दा से एक माह ली थी कोचिंग
श्रीकृष्ण ने 1957 में अजमेर में राजकुमारी स्पोर्ट्स कालेज में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से एक माह तक कोचिंग ली थी। इसके बाद श्रीकृष्ण के ध्यानचंद के बड़े बेटे से मित्रता हुई।
बच्चों को सिखाने की तमन्ना आज भी
अजमेर से आने के बाद श्रीकृष्ण ने काठगोदाम के मल्ला ब्यूरा में मकान बनाया। वह अजमेर में 25 वर्ष तक रहे। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उत्तराखंड में खेल नीति नहीं है। अच्छे कोच न होने से हॉकी और फुटबॉलमें कैरियर ढूंढ रहे युवा आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। बच्चों को हॉकी के गुर सिखाने की तमन्ना आज भी हैं।