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'प्रलय रुका तो मंदिर के चारों ओर फैले थे शव'
देहरादून/अंकित चौधरी
Updated Fri, 21 Jun 2013 11:46 AM IST
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आंखों में आंसू लिए कांपती आवाज में उन्होंने बताया कि केवल 10 मिनट और छह हजार जिंदगी खत्म हो गई थी...।
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केदारनाथ से दून पहुंची दिल्ली निवासी नेहा मिश्र ने बताया कि सोमवार सुबह तकरीबन छह बजे धमाके की आवाज आई।
किसी को पता नहीं चला कि क्या हुआ। करीब सात बजे अचानक बचाओ-बचाओ की आवाज गूंजी।
कहां गए केदारघाटी से 20 हजार लोग?
आपदा में मां, दादी और नानी को खो देने वाली नेहा ने बताया कि पानी के रूप में प्रलय दबे पांव आया। इससे पहले कि किसी को एहसास होता पानी मंदिर में तेजी से चारों तरफ घूमा और परिसर के दक्षिणी गेट को तोड़ता मौजूद श्रद्धालुओं को मलबे में दफन कर गया।
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मंदिर के चारों ओर 400 मीटर एरिया में मौजूद सात हजार लोगों में से एक हजार ही बचे।
तस्वीरों में: तबाही के बाद राहत का इंतजार
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बचने वाले भी वे हैं जो होटलों और भवनों के ऊपर वाले तलों पर पहुंच गए थे। जल प्रलय के बाद हर तरफ केवल मलबा-ही-मलबा था। डर इतना कि कहीं पैर के नीचे कोई शव न हो। जब बाहर का नजारा देखा तो मंदिर के चारों ओर शव-ही-शव नजर आ रहे थे...।
सकते में थे भाई-बहन
जल प्रलय के बाद सुरक्षित बची यमुना विहार रोड दिल्ली निवासी एलएलबी की छात्रा नेहा मिश्र चॉपर से बृहस्पतिवार को दून पहुंची। नेहा और उसके दो भाई-बहन सकते में नजर आए। नेहा ने बताया कि सोमवार सुबह करीब सात बजे तेज गति मलबा और पानी बहकर आने की सूचना पाते ही सभी सुरक्षित स्थान की ओर भागे।
कुछ मिनट बाद ही वह होटल तक पहुंच गए, लेकिन दस कदम पीछे चल रहा उनका आधा परिवार मलबे के साथ कहां गया, कुछ पता नहीं चला। केवल पत्थरों का शोर और लोगों की चीख-पुकार ही सुनाई देती रही।
गंदे पानी से बुझाई प्यास
जान बचाने के लिए नेहा और उसके भाई-बहन को गंदे पानी से प्यास बुझानी पड़ी। इन 24 घंटों में खाने के लिए कुछ नहीं मिला।
तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत
मंगलवार रात रेस्क्यू करने पहुंची टीम ने उन्हें निकालकर चॉपर से पहले गुप्तकाशी छोड़ा। पैसे नहीं होने के कारण यहां कदम रुक गए। सेना ने हैलीपैड के बाहर नाम दर्ज करने के बाद छोड़ दिया।
दो दिन बाद बृहस्पतिवार को इन्हें चॉपर से दून छोड़ा गया है। लेकिन पापा और नाना गुप्तकाशी में ही हैं। दोनों की तबीयत खराब है। वह अपने दादा के साथ यहां पहुंची थीं।