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केदारघाटी से लोगों को तीसरे दिन ही निकाल लिया था !

Sat, 13 Jul 2013 11:33 AM IST
देहरादून/ब्यूरो
देहरादून/ब्यूरो Updated Sat, 13 Jul 2013 11:33 AM IST
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destruction in kedarnath

बदरीनाथ में फंसे हुए लोग हेलीकाप्टर का इंतजार करते रहे। केदारनाथ में बचाव अभियान हेलीकाप्टर के भरोसे रहा और छह दिन देर से शुरू हुआ। इस पूरे समय में स्थानीय लोगों ने अपनी मदद खुद की।

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स्थानीय लोगों ने की मदद
पहाड़ को भली-भांति जानने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि किस उफनाए हुए नाले को कहां से पार किया जा सकता है। किस पहाड़ पर चढ़ना मौत को दावत देना है और किस घाटी से किस तरह से बाहर निकला जा सकता था। हालांकि सड़क पर निर्भरता से यह आदत इनकी भी टूट रही है पर भूगोल का ज्ञान मौजूद हैं।
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इसी ज्ञान का उपयोग कर केदार घाटी में कुछ फंसे हुए लोगों को 17 जून के तीन दिन बाद ही स्थानीय लोग निकाल कर ले भी आए थे।

रुद्रप्रयाग तैला के ही रहने वाले और केदारनाथ में पुजारी नरेश कुकरेती के मुताबिक उनके सामने ही कुछ यात्रियों ने केदारनाथ में उफनती हुई नदी को पार करने की कोशिश में जान गंवाई। केदारनाथ से चलकर वे खुद ही कई लोगों के साथ गरुड़चट्टी पहुंच गए थे। इस इलाके से वे पहले से ही परिचित रहे हैं। जाहिर है कि बचाव कार्य में स्थानीय लोगों का साथ लिया जाता तो बचाव कार्य और आसान हो जाता।
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हेलीकाप्टर का इंतजार छोड़कर तुरंत ही बचाव दल सक्रिय होते तो रामबाड़ा से बचकर निकले कई लोग बचाए जा सकते थे। स्थानीय मदद को किस कदर दरकिनार किया गया यह भी इस तबाही में देखने को मिला। केदार घाटी में फंसे हुए यात्रियों को निकालने के लिए तीन दिन तक हेलीकाप्टर का इंतजार किया जाता रहा।

जबकि स्थानीय लोगों ने पैदल मार्ग का उपयोग कर अपने फंसे हुए लोगों को प्रभावित क्षेत्रों से बाहर निकाला। बदरीनाथ से ही पैदल मार्ग का उपयोग आपदा घटित होने के करीब छह दिन बाद किया गया।


मौसम में बदलाव से ध्वस्त हो रहा है अनुमान

मौसम में बदलाव का स्थानीय लोगों का अनुमान भी ध्वस्त हो रहा है। जुलाई में बरसात के आदी लोग अब जून में आपदा सहने को विवश है। अगस्त-सितंबर में बरसात से इनका दिल धड़कता है। जाहिर है कि मौसम का बदलाव इन लोगों पर भी भारी पड़ रहा है।

भ्यूंदार के लोगों को अगर थोड़ा और समय मिलता तो ये लोग ऊपर के गांवों में होते। नदी तट पर बसे गांव से हटने का समय भी आ ही गया था। दुर्गम क्षेत्रों में बने बांध नदियों की विकरालता के इनके अंदाजे को ध्वस्त कर रहा है।

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