{"_id":"1066159c-e144-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"defender-of-thousands-of-village-feed-obedient","type":"story","status":"publish","title_hn":"हजारों का रक्षक गांव दाने-दाने को मोहताज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हजारों का रक्षक गांव दाने-दाने को मोहताज
गंगा असनोड़ा थपलियाल
Updated Sun, 30 Jun 2013 10:45 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गौरीकुंड, रामबाड़ा, सीतापुर व सोनप्रयाग में फंसे करीब चार हजार लोगों को आसरा देने वाले त्रिजुगीनारायण गांव के लोगों ने तीर्थयात्रियों के लिए अपने कोठार (पहाड़ों में अनाज रखने का लकड़ी से बना बड़ा सा बरतन) तो खाली कर दिए, लेकिन अब वे दाने-दाने को मोहताज हैं।
विज्ञापन
कुछ अपनी खेती से, तो कुछ बाहर से लाए गए चावलों से पूरे छह माह के लिए कोठार भरे हुए थे, जो आज खाली हो गए हैं। राहत की बात यह है कि 13 दिन बाद इस क्षेत्र में मोबाइल बजने शुरू हुए हैं। त्रिजुगीनारायण गांव के अधिकांश लोग या तो केदारनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित हैं या फिर सोनप्रयाग, सीतापुर तथा गौरीकुंड क्षेत्र में लॉज चलाया करते हैं।
विज्ञापन
चारधाम यात्रा शुरू होते ही रोजगार के लिए युवा व अन्य पुरुष गांव में नहीं रह पाते। इसलिए महिलाओं व बच्चों के लिए छह माह का अनाज एकसाथ भर देते हैं। अपने बच्चों के लिए भरे हुए इसी अनाज से 16 जून को आई त्रासदी के बाद या तबाही की आशंका होने पर किमाणा, तोशी, मजोशी तथा त्रिजुगीनारायण गांव के ग्रामीण अपने साथ करीब चार हजार यात्रियों को गांव तक ले आए थे।
विज्ञापन
गौरीकुंड तथा केदारनाथ क्षेत्र में राशन सप्लाई करने वाले ग्रेन डीलर राजकुंवर सेमवाल कहते हैं कि सोनप्रयाग में उनकी सस्ते गल्ले की दुकान थी। जब केदारनाथ से अपने साथ भारी मात्रा में मलबा ला रही नदी का स्तर करीब 60 फीट से अधिक हो चला था। तबाही की आशंका पर सोनप्रयाग के सभी लॉज खाली कराकर लॉज मालिकों ने यात्रियों को त्रिजुगीनारायण गांव की ओर बढ़ने के लिए कहा।
भयभीत यात्रियों ने भी लॉज मालिकों की बात मानी। इसी तरह गौरीकुंड में भी भागने में सफल रहे यात्रियों ने गौरी गांव तथा त्रिजुगीनारायण गांवों की शरण ली। ग्रामीण शंकर प्रसाद तिवारी तथा बुद्धि प्रकाश गैरोला बताते हैं कि उनके घर पर करीब 15 लोग ठहरे हुए थे। हर घर का यही हाल था। गांव में 14 कमरों की काली कमली धर्मशाला ठसाठस भरी थी।
गांव वालों की मानें तो दो हजार से अधिक यात्री तथा इतनी ही संख्या में नेपाली मजदूर शरण लिए हुए थे। गांव के युवाओं के छह लॉज भी पूरी तरह फुल थे। इन्हें यात्रियों के लिए निशुल्क खोला गया था। गांव के उपप्रधान रामचंद्र सेमवाल कहते हैं कि पूरा गांव एकजुट होकर अपनी जान बचाने पहुंचे यात्रियों को संभालने के लिए संकल्पबद्ध था। ग्रामीणों ने अब तक उनके लिए कोई राहत न भिजवाने पर दुख जताया है।
अमर उजाला ने पहुंचाया परमार परिवार का संदेश
अमर उजाला में प्रकाशित खबर से परमार परिवार के सकुशल घर पहुंचने का संदेश त्रिजुगीनारायण गांव के लोगों तक पहुंच गया है।
'मोबाइल टावरों का इतने दिनों तक बंद रहना सबसे बड़ी समस्या रही। ग्रामीणों के पास अनाज का दाना नहीं है और कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।'
आशीष भट्ट, स्थानीय निवासी त्रिजुगीनारायण