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Champawat News: नंधौर अभयारण्य... तितलियों की उड़ान, पक्षियों का शोर खींच लेता है अपनी ओर
Wed, 21 May 2025 10:25 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Wed, 21 May 2025 10:25 PM IST
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टनकपुर में मिलने वाले दुर्लभ रेड हेडेड ट्रैगोन पक्षी। स्रोत : नेचर गाइड
चंपावत। जिला जैव विविधता से भरपूर है। यहां दुर्लभ प्रजाति के पशु-पक्षी, तितलियां, कीट-पतंगे हैं। टनकपुर नंधौर वन्यजीव अभयारण्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लोहाघाट क्षेत्र में मायावती आश्रम का जंगल जैव विविधता से भरपूर है। यहां अभी मानव हस्तक्षेप कम है, इसलिए यहां जीव-जंतु संरक्षित हैं।
नेचर गाइड सौरभ कलखुड़िया बताते हैं कि नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में बुधियार क्षेत्र में सबसे अधिक जैव विविधता पाई जाती है। जानवर, पिट वाइपर स्नैक, फिश आउलेट, रेड हेडेड ट्रैगोन आदि कई प्रकार के पक्षी यहां हैं। कई विदेशी पक्षी भी प्रवास पर टनकपुर आते हैं। खोपाताल तितलियों और पक्षियों के लिए दूसरी मुफीद जगह है। यहां आने वाले पर्यटकों को विभिन्न प्रकार की जैव विविधता देखने को मिलती है। चल्थी, सिन्याड़ी क्षेत्र बी ईटर और पल्म हेडेड तोतों और अन्य पक्षियों परिपूर्ण है। यहां उनकी चहचहाहट सुनाई देती है।
कोट
चंपावत का चाय बागान और हिंग्ला देवी मंदिर क्षेत्र में भी कई तरह के पक्षी दिखाई देते हैं। इसके अलावा बाघ की ट्रेल होने के करण उनका यहां मूवमेंट बना रहता है। - डॉ. एनसी पंत, डीएफओ
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थलकेदार, यहां जैव विविधता की भरमार
वन विभाग ने धरोहर स्थल घोषित करने को बायो डायवर्सिटी बोर्ड को भेजा है प्रस्ताव
संवाद न्यूज एजेंसी
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय का नजदीकी वन आच्छादित क्षेत्र थलकेदार (2480 मीटर) जैव विविधता से परिपूर्ण है। यहां बांज, बुरांश, खर्मू, मोरू के सघन वन हैं। सांभर, खरगोश, हिरन, घुरल, तेंदुआ, हिमालयन काला भालू, मैना आदि यहां वास करते हैं। किल्मोड़ा, घिंघारू, तिमूर, समेना, चिरायता, सालममिश्री, वन हल्दी आदि भी यहां प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
प्रभागीय वनाधिकारी आशुतोष सिंह ने बताया कि थलकेदार के जंगल को जैव विविधता धरोहर स्थल घोषित करने के लिए वन विभाग ने बायो डायवर्सिटी बोर्ड को पांच लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर भेजा था। पहले चरण में 2.50 लाख रुपये मिले हैं। इससे भैंलीत, तोली, देवदार, बड़ावे, ज्ञालपानी, पत्थरखानी, मांड गांवों की धरोहर, बांज का जंगल, मंदिर, वन्य जीवों के प्रकृति आवास के लिए कार्य किया गया। बताया कि थलकेदार में रिजर्व फॉरेस्ट 600 हेक्टेयर क्षेत्र में है।
ग्रामीणों के सहयोग से वन का अध्ययन किया गया कि क्षेत्र में पहले कौन सी प्रजातियां, जीव जंतु आदि थे। ग्रामीणों से धरोहर संरक्षित करने का अनुरोध किया गया है। इसके लिए ग्रामीणों के साथ लगातार बैठकें की गईं। वन्य जीवों के प्राकृतिक वास, पेयजल स्रोत, मंदिर आदि बचाने के लिए उनसे आगे आने का आह्वान किया गया।
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नेचर गाइड सौरभ कलखुड़िया बताते हैं कि नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में बुधियार क्षेत्र में सबसे अधिक जैव विविधता पाई जाती है। जानवर, पिट वाइपर स्नैक, फिश आउलेट, रेड हेडेड ट्रैगोन आदि कई प्रकार के पक्षी यहां हैं। कई विदेशी पक्षी भी प्रवास पर टनकपुर आते हैं। खोपाताल तितलियों और पक्षियों के लिए दूसरी मुफीद जगह है। यहां आने वाले पर्यटकों को विभिन्न प्रकार की जैव विविधता देखने को मिलती है। चल्थी, सिन्याड़ी क्षेत्र बी ईटर और पल्म हेडेड तोतों और अन्य पक्षियों परिपूर्ण है। यहां उनकी चहचहाहट सुनाई देती है।
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कोट
चंपावत का चाय बागान और हिंग्ला देवी मंदिर क्षेत्र में भी कई तरह के पक्षी दिखाई देते हैं। इसके अलावा बाघ की ट्रेल होने के करण उनका यहां मूवमेंट बना रहता है। - डॉ. एनसी पंत, डीएफओ
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थलकेदार, यहां जैव विविधता की भरमार
वन विभाग ने धरोहर स्थल घोषित करने को बायो डायवर्सिटी बोर्ड को भेजा है प्रस्ताव
संवाद न्यूज एजेंसी
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय का नजदीकी वन आच्छादित क्षेत्र थलकेदार (2480 मीटर) जैव विविधता से परिपूर्ण है। यहां बांज, बुरांश, खर्मू, मोरू के सघन वन हैं। सांभर, खरगोश, हिरन, घुरल, तेंदुआ, हिमालयन काला भालू, मैना आदि यहां वास करते हैं। किल्मोड़ा, घिंघारू, तिमूर, समेना, चिरायता, सालममिश्री, वन हल्दी आदि भी यहां प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
प्रभागीय वनाधिकारी आशुतोष सिंह ने बताया कि थलकेदार के जंगल को जैव विविधता धरोहर स्थल घोषित करने के लिए वन विभाग ने बायो डायवर्सिटी बोर्ड को पांच लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर भेजा था। पहले चरण में 2.50 लाख रुपये मिले हैं। इससे भैंलीत, तोली, देवदार, बड़ावे, ज्ञालपानी, पत्थरखानी, मांड गांवों की धरोहर, बांज का जंगल, मंदिर, वन्य जीवों के प्रकृति आवास के लिए कार्य किया गया। बताया कि थलकेदार में रिजर्व फॉरेस्ट 600 हेक्टेयर क्षेत्र में है।
ग्रामीणों के सहयोग से वन का अध्ययन किया गया कि क्षेत्र में पहले कौन सी प्रजातियां, जीव जंतु आदि थे। ग्रामीणों से धरोहर संरक्षित करने का अनुरोध किया गया है। इसके लिए ग्रामीणों के साथ लगातार बैठकें की गईं। वन्य जीवों के प्राकृतिक वास, पेयजल स्रोत, मंदिर आदि बचाने के लिए उनसे आगे आने का आह्वान किया गया।