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दावाग्नि : रीठा साहिब के पास का जंगल धधका
Thu, 15 Jun 2023 10:57 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Thu, 15 Jun 2023 10:57 PM IST
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रीठा साहिब के पास के जंगल में लगी आग। संवाद
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रीठा साहिब (चंपावत)। दावाग्नि काल 15 जून को औपचारिक रूप से समाप्त हो गया लेकिन बृहस्पतिवार को रीठा साहिब क्षेत्र का जंगल आग की चपेट में आ गया। भीषण गर्मी से बढ़ रही तपिश की मार यहां के जंगलों पर भी पड़ी है। रीठा साहिब क्षेत्र में परेवा, बिनवालगांव क्षेत्र के चीड़ के जंगल में आग लगने से आधे हेक्टेयर जंगल को नुकसान पहुंचा है। अलबत्ता वन विभाग और स्थानीय लोगों की मशक्कत से आग पर काबू पाया जा सका। अलबत्ता आग की वजह से कई जगह धुंध छा गई।
दावाग्नि काल खत्म, इस बार कम जले जंगल
आग की 20 घटनाओं में 12.50 हेेक्टेयर जंगल प्रभावित
पिछले साल की अपेक्षा 80 प्रतिशत कम जला जंगल
फिलहाल जारी रहेगी फायर वॉचर की सेवा
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। 15 फरवरी से शुरू दावाग्नि अवधि औपचारिक रूप से 15 जून को खत्म हो गई। भीषण गर्मी की तपिश अभी भी बनी हुई है। बृहस्पतिवार को भी चंपावत के पहाड़ में ही पारा करीब 30 डिग्री सेल्सियस तापमान था। पिछले साल की अपेक्षा 80 प्रतिशत जंगल कम जले। 20 घटनाओं में 12.50 हेक्टेयर जंगल जले। वन विभाग जंगल के नुकसान को कम करने में कामयाब रहा। 2022 में 52 हेक्टेयर वन संपदा पर असर पड़ा था।
चंपावत क्षेत्र में आरक्षित, पंचायती और सिविल तीनों तरह के जंगल करीब 95 हजार हेक्टेयर हैं। डीएफओ आरसी कांडपाल का कहना है कि 20 घटनाओं में 12.50 हेक्टेयर वन संपदा प्रभावित हुई। आग से प्रभावित हुई वन संपदा की कीमत 37 हजार रुपये आंकी गई है। डीएफओ का कहना है कि तपिश बढऩे और कुछ जगह अराजक तत्वों की हरकतों के बावजूद जन जागरूकता और विभागीय पहल से आग पर काबू पाया जा सका। दावाग्नि अवधि खत्म होने के बावजूद विभाग सभी फायर वॉचर की सेवा बारिश शुरू होने तक जारी रखेगा। उत्तराखंड बनने के बाद जंगलों को सबसे कम नुकसान कोरोना काल में 2020 में हुआ था। तब आग की सिर्फ आठ घटनाएं हुईं थी, जिसमें साढ़े सात हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ था।
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दावाग्नि की घटनाएं:
वर्ष- घटनाएं- प्रभावित क्षेत्र (हेक्टेयर में)
2019 111 161.39
2020 8 7.50
2021 73 57.77
2022 80 52.25
2023 20 12.50
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दावाग्नि काल खत्म, इस बार कम जले जंगल
आग की 20 घटनाओं में 12.50 हेेक्टेयर जंगल प्रभावित
पिछले साल की अपेक्षा 80 प्रतिशत कम जला जंगल
फिलहाल जारी रहेगी फायर वॉचर की सेवा
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। 15 फरवरी से शुरू दावाग्नि अवधि औपचारिक रूप से 15 जून को खत्म हो गई। भीषण गर्मी की तपिश अभी भी बनी हुई है। बृहस्पतिवार को भी चंपावत के पहाड़ में ही पारा करीब 30 डिग्री सेल्सियस तापमान था। पिछले साल की अपेक्षा 80 प्रतिशत जंगल कम जले। 20 घटनाओं में 12.50 हेक्टेयर जंगल जले। वन विभाग जंगल के नुकसान को कम करने में कामयाब रहा। 2022 में 52 हेक्टेयर वन संपदा पर असर पड़ा था।
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चंपावत क्षेत्र में आरक्षित, पंचायती और सिविल तीनों तरह के जंगल करीब 95 हजार हेक्टेयर हैं। डीएफओ आरसी कांडपाल का कहना है कि 20 घटनाओं में 12.50 हेक्टेयर वन संपदा प्रभावित हुई। आग से प्रभावित हुई वन संपदा की कीमत 37 हजार रुपये आंकी गई है। डीएफओ का कहना है कि तपिश बढऩे और कुछ जगह अराजक तत्वों की हरकतों के बावजूद जन जागरूकता और विभागीय पहल से आग पर काबू पाया जा सका। दावाग्नि अवधि खत्म होने के बावजूद विभाग सभी फायर वॉचर की सेवा बारिश शुरू होने तक जारी रखेगा। उत्तराखंड बनने के बाद जंगलों को सबसे कम नुकसान कोरोना काल में 2020 में हुआ था। तब आग की सिर्फ आठ घटनाएं हुईं थी, जिसमें साढ़े सात हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ था।
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दावाग्नि की घटनाएं:
वर्ष- घटनाएं- प्रभावित क्षेत्र (हेक्टेयर में)
2019 111 161.39
2020 8 7.50
2021 73 57.77
2022 80 52.25
2023 20 12.50