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लैंप के उजाले में रात गुजारने को मजबूर हैं 35 परिवार
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
Updated Sat, 09 Sep 2017 10:28 PM IST
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चंपावत का विद्युत विहीन पाटी ब्लाक का अल्यूड़ा गांव।
- फोटो : अमर उजाला
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पाटी ब्लॉक की चौड़ागूंठ ग्राम पंचायत के अल्यूड़ा और तोली तोक अब तक बिजली की सुविधा से नहीं जुड़ पाए हैं। इन तोकों में रह रहे 35 परिवार लैंप के उजाले में रात गुजारने को मजबूर हैं। बिजली न होने से इनमें रह रहे लोगों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 72 किलोमीटर दूर स्थित चौड़ागूंठ ग्राम पंचायत के अल्यूड़ा और तोली तोक अल्मोड़ा जिले की सीमा पर पड़ते हैं। ये दोनों चंपावत जिले के आखिरी तोक हैं। अल्यूड़ा तोक में 20 परिवार तथा तोली में 15 परिवार रहते हैं। बिजली की सुविधा न होने से यहां रह रहे ग्रामीणों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। गांव में कुछ परिवारों के पास सोलर ऊर्जा और सोलर लालटेन हैं, लेकिन ज्यादातर परिवार रोशनी के लिए पूरी तरह लैंप पर निर्भर हैं। लैंप जलाने के लिए भी इनको केरोसिन जुटाना चुनौती रहता है।
क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता गिरधारी नाथ, महेश चंद्र, गोपाल नाथ आदि का कहना है कि यहां रह रहे लोगों को केवल बिजली ही नहीं स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जूझना पड़ रहा है। क्षेत्र को बिजली की सुविधा से जोड़ने की मांग को लेकर वह कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को वह अपनी पीड़ा बता चुके हैं।
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इसके बाद भी उनकी समस्याएं जस की तस हैं। उनका कहना है कि इन तोकों के चारों तरफ घने जंगल होने के कारण रात के समय जंगली जानवरों का भय बना रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि विधानसभा और लोक सभा चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से क्षेत्र को बिजली व अन्य सुविधाओं से जोड़ने आश्वासन तो दिया जाता है। मतदान की प्रक्रिया निपटने के बाद कोई भी पलट कर यहां का रुख नहीं करता है।
350 तोक हैं बिजली की सुविधा से वंचित
चंपावत। पावर कारपोरेशन के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार का कहना है कि जिले की 313 ग्राम पंचायतों के करीब 350 तोक विद्युतीकरण से वंचित हैं। विद्युतीकरण से वंचित तोकों को बिजली सुविधा से जोड़ने के प्रस्ताव पर कार्य किया जा रहा है। कुछ तोकों को विद्युतीकरण के लिए जिला योजना में शामिल किया गया है।
डीजल मंगाकर काम चलाना पड़ता है
चंपावत। बिजली की सुविधा न होने से परेशान पाटी विकासखंड की चौड़ागूंठ ग्राम पंचायत के अल्यूड़ा और तोली तोक के ग्रामीणों का कहना है कि केरोसिन न मिलने के कारण उन्हें समय-समय पर काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। ऐसे में उजाले के लिए उन्हें या तो चीड़ के छिलकों पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर लोहाघाट या अल्मोड़ा से डीजल मंगाकर काम चलाना पड़ता है।
जिला मुख्यालय से करीब 72 किलोमीटर दूर स्थित चौड़ागूंठ ग्राम पंचायत के अल्यूड़ा और तोली तोक अल्मोड़ा जिले की सीमा पर पड़ते हैं। ये दोनों चंपावत जिले के आखिरी तोक हैं। अल्यूड़ा तोक में 20 परिवार तथा तोली में 15 परिवार रहते हैं। बिजली की सुविधा न होने से यहां रह रहे ग्रामीणों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। गांव में कुछ परिवारों के पास सोलर ऊर्जा और सोलर लालटेन हैं, लेकिन ज्यादातर परिवार रोशनी के लिए पूरी तरह लैंप पर निर्भर हैं। लैंप जलाने के लिए भी इनको केरोसिन जुटाना चुनौती रहता है।
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क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता गिरधारी नाथ, महेश चंद्र, गोपाल नाथ आदि का कहना है कि यहां रह रहे लोगों को केवल बिजली ही नहीं स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जूझना पड़ रहा है। क्षेत्र को बिजली की सुविधा से जोड़ने की मांग को लेकर वह कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को वह अपनी पीड़ा बता चुके हैं।
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इसके बाद भी उनकी समस्याएं जस की तस हैं। उनका कहना है कि इन तोकों के चारों तरफ घने जंगल होने के कारण रात के समय जंगली जानवरों का भय बना रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि विधानसभा और लोक सभा चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से क्षेत्र को बिजली व अन्य सुविधाओं से जोड़ने आश्वासन तो दिया जाता है। मतदान की प्रक्रिया निपटने के बाद कोई भी पलट कर यहां का रुख नहीं करता है।
350 तोक हैं बिजली की सुविधा से वंचित
चंपावत। पावर कारपोरेशन के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार का कहना है कि जिले की 313 ग्राम पंचायतों के करीब 350 तोक विद्युतीकरण से वंचित हैं। विद्युतीकरण से वंचित तोकों को बिजली सुविधा से जोड़ने के प्रस्ताव पर कार्य किया जा रहा है। कुछ तोकों को विद्युतीकरण के लिए जिला योजना में शामिल किया गया है।
डीजल मंगाकर काम चलाना पड़ता है
चंपावत। बिजली की सुविधा न होने से परेशान पाटी विकासखंड की चौड़ागूंठ ग्राम पंचायत के अल्यूड़ा और तोली तोक के ग्रामीणों का कहना है कि केरोसिन न मिलने के कारण उन्हें समय-समय पर काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। ऐसे में उजाले के लिए उन्हें या तो चीड़ के छिलकों पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर लोहाघाट या अल्मोड़ा से डीजल मंगाकर काम चलाना पड़ता है।