{"_id":"f7ed5b8478b417ce3d17b6cb9339d8e6","slug":"believe-in-hinduism-but-don-t-know-about-saradh","type":"story","status":"publish","title_hn":"मानते हैं हिंदू धर्म लेकिन नहीं जानते श्राद्घ!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मानते हैं हिंदू धर्म लेकिन नहीं जानते श्राद्घ!
अमर उजाला/संजू पंत, डीडीहाट
Updated Thu, 03 Oct 2013 04:52 PM IST
विज्ञापन
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष सबसे पवित्र माना जाता है, लेकिन हिंदू होने के साथ-साथ हर परंपरा और संस्कृति को मानने वाला समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जिनके लिए पितृपक्ष मायने नहीं रखता।
विज्ञापन
या यूं कहें कि ये श्राद्ध करते ही नहीं। यह वर्ग है आदम जनजाति के वनरावत। इस वर्ग की मान्याता भले वर्षों पुरानी हो सकती है, मगर इन्हें पितरों से मुंह फेरने वाला भी नहीं कहा जा सकता।
विज्ञापन
पढें, ...जब देवदूत बन गए थे मुजफ्फरनगर के लोग
विज्ञापन
क्रिया में बैठने वाला अंधेरे कमरे में बंद
क्योंकि जब परिवार में किसी की मौत होती है तो क्रियाकर्म करने वाला कई दिनों तक अंधेरे कमरे में रहता है। सूर्य की किरण तक वहां नहीं पहुंचती।
इसके बाद ये पीपलपानी भी उतनी ही श्रद्धा से करते हैं। कुलेख, औलतड़ी, खिरद्वारी सहित आधा दर्जन से अधिक गांवों में इनकी संख्या 732 हैं। उनकी कई मान्यताएं और परंपराएं हिंदुओं से मिलती हैं। आमतौर पर वे आठूं के अलावा अन्य त्योहार नहीं मनाते।
आंठू को पहनते हैं नए कपड़े
आठूं को वे बिरुड़ी और नए कपड़े पहनते हैं, लेकिन श्राद्ध को ये समाज नहीं मानता। वे सिर्फ श्राद्ध की अमावास्या को पूड़ी और अन्य पकवान बनाते हैं और इसको स्वयं खाते हैं।
नहीं जानते कारण
52 साल के केशर सिंह रावत वनराजि कहते हैं श्राद्ध को नहीं मनाने की परंपरा नई नहीं है। इसे उनके बुजुर्ग भी नहीं मनाते थे। और वे इसका ही अनुसरण कर रहे हैं। पर बुजुर्ग क्यों नहीं मनाते थे? ये वह नहीं जानते।
पढें, केदारनाथः जत्थों में चलेंगे यात्री, पुलिस भी होगी साथ
43 वर्षीय दीपा देवी, 36 साल के शंकर रावत और 50 वर्ष के जगत सिंह रावत का कहना है कि वे श्राद्ध के बारे में नहीं जानते। उनके पूर्वजों ने कभी इसे नहीं मनाया। माना जाता है कि श्राद्ध नहीं मनाने के पीछे सामाजिक कारण के अलावा उनका पिछड़ापन भी बड़ा कारण हो सकता है।
जंगल से था जुड़ाव
ये लोग आर्थिक रूप से बेहद कमजोर थे। मुख्य रूप से आजीविका के लिए जंगल से जुड़े कामों पर आश्रित थे। ज्यादातर वक्त जंगल और इसके आसपास रहने की वजह से श्राद्ध की जानकारी उन्हें नहीं थी।
ऐसे होता है अंतिम संस्कार
वनरावत अंतिम संस्कार को पूरी तरह हिंदू रीति रिवाज से मनाते हैं। इस दौरान वे बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं। कमरे को अंधेरा रखते हैं। यहां तक कि कमरे में सूर्य की रोशनी भी नहीं पहुंचने देते।
क्रिया में बैठा शख्स किसी अन्य के हाथ की कोई भी चीज ग्रहण नहीं करता। एक वक्त भोजन होता और वह भी खुद का बनाया हुआ। पानी की व्यवस्था भी वह अंधेरे में ही करते हैं।