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Bageshwar News: गढ़-कुमाऊं की साझा संस्कृति की धरोहर को भारी क्षति
Sat, 17 Oct 2026 12:37 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Sat, 17 Oct 2026 12:37 AM IST
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कपकोट के बदियाकोट मंदिर में लगी आग। स्रोत जागरूक पाठक
बागेश्वर। कपकोट के मल्ला दानपुर क्षेत्र के बदियाकोट स्थित ऐतिहासिक आदिबद्री मां नंदा भगवती मंदिर में भीषण आग लगने से मुख्य मंदिर को भारी क्षति पहुंची है। नवरात्र के दौरान हुई इस घटना से चौदह पट्टी दानपुर के ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में शोक है। क्षेत्रवासी इसे केवल मंदिर भवन का नुकसान नहीं बल्कि गढ़-कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक विरासत को पहुंची बड़ी क्षति मान रहे हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर सदियों पुराना है और दानपुर क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां मां भगवती के साथ तिब्बती हूण देवता और लाटू देवता की भी संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। इस वजह से मंदिर को कुमाऊं, गढ़वाल और तिब्बत की साझा सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है।
मंदिर की लकड़ियों पर की गई पारंपरिक नक्काशी इसकी विशिष्ट पहचान थी। यह मंदिर सोराग, खाती, वाछम, तीख और डौला समेत चौदह पट्टियों के गांवों के लोगों की आस्था से जुड़ा रहा है। हर आठ वर्ष में आयोजित होने वाली आठ्यौं जात और चार वर्ष में होने वाली घर-आठ्यौं जैसी लोक परंपराओं के आयोजन में भी मंदिर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
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अग्निकांड के बाद प्रशासन और संबंधित विभागों की टीमें मौके पर पहुंचकर नुकसान का आकलन कर रही हैं। क्षेत्रवासियों ने घटना पर दुख जताते हुए मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जरूरत बताई है।
कोट
बदियाकोट मंदिर में आग लगने की घटना अत्यंत हृदयविदारक है। यह मंदिर क्षेत्र की जन-आस्था का मुख्य केंद्र है। इस आस्था को किसी भी हाल में डिगने नहीं दिया जाएगा। पूर्व की भांति भव्य मंदिर का निर्माण जल्द कराया जाएगा। इसके लिए धन की कोई कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी। प्रशासन को घटना के कारणों की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए गए हैं। -सुरेश गढि़या, विधायक, कपकोट
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स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर सदियों पुराना है और दानपुर क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां मां भगवती के साथ तिब्बती हूण देवता और लाटू देवता की भी संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। इस वजह से मंदिर को कुमाऊं, गढ़वाल और तिब्बत की साझा सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है।
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मंदिर की लकड़ियों पर की गई पारंपरिक नक्काशी इसकी विशिष्ट पहचान थी। यह मंदिर सोराग, खाती, वाछम, तीख और डौला समेत चौदह पट्टियों के गांवों के लोगों की आस्था से जुड़ा रहा है। हर आठ वर्ष में आयोजित होने वाली आठ्यौं जात और चार वर्ष में होने वाली घर-आठ्यौं जैसी लोक परंपराओं के आयोजन में भी मंदिर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
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अग्निकांड के बाद प्रशासन और संबंधित विभागों की टीमें मौके पर पहुंचकर नुकसान का आकलन कर रही हैं। क्षेत्रवासियों ने घटना पर दुख जताते हुए मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जरूरत बताई है।
कोट
बदियाकोट मंदिर में आग लगने की घटना अत्यंत हृदयविदारक है। यह मंदिर क्षेत्र की जन-आस्था का मुख्य केंद्र है। इस आस्था को किसी भी हाल में डिगने नहीं दिया जाएगा। पूर्व की भांति भव्य मंदिर का निर्माण जल्द कराया जाएगा। इसके लिए धन की कोई कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी। प्रशासन को घटना के कारणों की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए गए हैं। -सुरेश गढि़या, विधायक, कपकोट