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Almora News: खामोश खुमाड़ की पीड़ा ... पलायन से वीरों की धरती पर वीरानी
Sun, 17 May 2026 10:25 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Sun, 17 May 2026 10:25 PM IST
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मौलेखाल (अल्मोड़ा)। बंद पड़े मकानों के जंग लगे ताले, झाड़ियों से भर चुके आंगन, सूने स्कूल और बंजर होते खेत। सल्ट ब्लॉक की ऐतिहासिक खुमाड़ ग्रामसभा आज अपने ही अस्तित्व की कहानी बयां कर रही है। कभी स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाने वाला यह गांव अब पलायन की मार से वीरान होता जा रहा है। जिस गांव की पहचान कभी देशभक्ति, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से होती थी वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ है।
11 बाखलियों वाले इस गांव की आबादी कभी 1200 से अधिक थी। गांव के खेत आबाद रहते थे और घरों में रौनक दिखाई देती थी, लेकिन रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में लोग लगातार शहरों की ओर पलायन करते गए। अब हालात यह हैं कि गांव में केवल करीब 250 लोग ही बचे हैं। कई मकान बंद पड़े हैं और खेती की जमीनें बंजर होती जा रही हैं।
गांव में रह रहे अधिकांश लोग आज छोटे-मोटे रोजगार, मेहनत-मजदूरी या सरकारी और निजी नौकरियों के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने गांव को धीरे-धीरे खाली कर दिया।
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शहीदों की स्मृतियों से जुड़ी है खुमाड़ की पहचान
खुमाड़ ग्रामसभा का स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान रहा है। पांच सितंबर 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के दौरान क्षेत्र के खीमानंद और चूणामणि समेत कई वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। उन्हीं शहीदों की स्मृति में हर वर्ष पांच सितंबर को शहीद दिवस मनाया जाता है। गांव के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शहीद दिवस मेले को राजकीय मेले का दर्जा दिया है।
बच्चों के अभाव में बंद हुआ स्कूल
पलायन का असर गांव की शिक्षा व्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कभी बच्चों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला प्राथमिक विद्यालय किचार अब बच्चों के अभाव में बंद हो चुका है। प्राथमिक विद्यालय खुमाड़, जहां कभी 350 से अधिक छात्र पढ़ते थे वहां अब सिर्फ 24 बच्चे रह गए हैं। इंटर कॉलेज में भी छात्रों की संख्या घटकर करीब 50 तक सिमट गई है।
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क्या बोले लोग
कक्षा दो तक गांव में रहकर ही पढ़ाई की। उस समय खुमाड़ गांव हरे-भरे वातावरण और लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहता था। बड़े भाई के न्यायपालिका में होने के कारण उनके साथ बाहर जाना पड़ा और जहां-जहां उनका स्थानांतरण हुआ, वहीं रहकर शिक्षा ग्रहण की। सेवानिवृत्ति के बाद गांव लौटकर वहीं बसूंगा और क्षेत्र के लोगों के लिए कुछ सकारात्मक कार्य कर उन्हें बेहतर दिशा देने का प्रयास करूंगा।
गोपाल दत्त, न्यायाधीश जिला कोर्ट, एटा-
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- हमारे समय में गांव के खेत पूरी तरह आबाद रहते थे। मंडुवा, झंगोरा, गेहूँ, धान, हल्दी, लहसुन, प्याज सहित कई मोटे अनाज और साग-सब्जियों की भरपूर खेती होती थी। आज पलायन और जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने खेती-किसानी को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।
हरि दत्त उपाध्याय, 78 वर्षीय ग्रामीण
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रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सड़क के अभाव में लोग मजबूर होकर शहरों की ओर जाते रहे और अभी भी हर साल कोई ना कोई परिवार पलायन कर रहा है।
जगत प्रकाश उपाध्याय, ग्रामीण, खुमाड़
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अब तक कोई ठोस नीति पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार और बेहतर भविष्य देने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।
अनी राम, 95 वर्षीय ग्रामीण
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11 बाखलियों वाले इस गांव की आबादी कभी 1200 से अधिक थी। गांव के खेत आबाद रहते थे और घरों में रौनक दिखाई देती थी, लेकिन रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में लोग लगातार शहरों की ओर पलायन करते गए। अब हालात यह हैं कि गांव में केवल करीब 250 लोग ही बचे हैं। कई मकान बंद पड़े हैं और खेती की जमीनें बंजर होती जा रही हैं।
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गांव में रह रहे अधिकांश लोग आज छोटे-मोटे रोजगार, मेहनत-मजदूरी या सरकारी और निजी नौकरियों के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने गांव को धीरे-धीरे खाली कर दिया।
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शहीदों की स्मृतियों से जुड़ी है खुमाड़ की पहचान
खुमाड़ ग्रामसभा का स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान रहा है। पांच सितंबर 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के दौरान क्षेत्र के खीमानंद और चूणामणि समेत कई वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। उन्हीं शहीदों की स्मृति में हर वर्ष पांच सितंबर को शहीद दिवस मनाया जाता है। गांव के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शहीद दिवस मेले को राजकीय मेले का दर्जा दिया है।
बच्चों के अभाव में बंद हुआ स्कूल
पलायन का असर गांव की शिक्षा व्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कभी बच्चों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला प्राथमिक विद्यालय किचार अब बच्चों के अभाव में बंद हो चुका है। प्राथमिक विद्यालय खुमाड़, जहां कभी 350 से अधिक छात्र पढ़ते थे वहां अब सिर्फ 24 बच्चे रह गए हैं। इंटर कॉलेज में भी छात्रों की संख्या घटकर करीब 50 तक सिमट गई है।
क्या बोले लोग
कक्षा दो तक गांव में रहकर ही पढ़ाई की। उस समय खुमाड़ गांव हरे-भरे वातावरण और लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहता था। बड़े भाई के न्यायपालिका में होने के कारण उनके साथ बाहर जाना पड़ा और जहां-जहां उनका स्थानांतरण हुआ, वहीं रहकर शिक्षा ग्रहण की। सेवानिवृत्ति के बाद गांव लौटकर वहीं बसूंगा और क्षेत्र के लोगों के लिए कुछ सकारात्मक कार्य कर उन्हें बेहतर दिशा देने का प्रयास करूंगा।
गोपाल दत्त, न्यायाधीश जिला कोर्ट, एटा-
- हमारे समय में गांव के खेत पूरी तरह आबाद रहते थे। मंडुवा, झंगोरा, गेहूँ, धान, हल्दी, लहसुन, प्याज सहित कई मोटे अनाज और साग-सब्जियों की भरपूर खेती होती थी। आज पलायन और जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने खेती-किसानी को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।
हरि दत्त उपाध्याय, 78 वर्षीय ग्रामीण
रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सड़क के अभाव में लोग मजबूर होकर शहरों की ओर जाते रहे और अभी भी हर साल कोई ना कोई परिवार पलायन कर रहा है।
जगत प्रकाश उपाध्याय, ग्रामीण, खुमाड़
अब तक कोई ठोस नीति पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार और बेहतर भविष्य देने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।
अनी राम, 95 वर्षीय ग्रामीण