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शिक्षा का फैलाया उंजियारा: लता ने अपनी बंजर जमीन पर सब्जियां उगा लोगों को राह दिखाई, देखादेखी कई बने सशक्त

Mon, 22 Jul 2024 12:46 PM IST
हीरा मेहरा बृजेश तिवारी, संवाद
बृजेश तिवारी, संवाद Published by: हीरा मेहरा Updated Mon, 22 Jul 2024 12:46 PM IST
सार

15 सालों तक वह कलम पकड़ कर नौनिहालों का भविष्य संवारती रही। अपनी इस तपस्या में उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर कई बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी दी। लता ने अब कलम छोड़कर कुदाल पकड़ ली और कई लोगों को रोजगार भी दिया। 

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Lata showed the way to the people by growing vegetables on her barren land in almora
लता ने अपनी बंजर जमीन पर सब्जियां उगा लोगों को राह दिखाई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

15 सालों तक वह कलम पकड़ कर नौनिहालों का भविष्य संवारती रही। अपनी इस तपस्या में उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर कई बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी दी लेकिन क्षेत्र में बेराेजगारी की समस्या और उसका बच्चों के भविष्य पर पड़ता असर देख उन्होंने कुछ ऐसा करने की ठान ली। जिससे ग्रामीण परिवेश के लोग अपने ही संसाधनों से आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें। कलम छोड़कर कुदाल पकड़ ली और अपनी दस नाली भूमि को हरा भरा करने में जुट गई। उन्होंने कई लोगों को रोजगार भी दिया। लता बताती है कि हर महीने आय निर्धारित नहीं होती। लेकिन विभिन्न प्रकार के उत्पादनों से सभी खर्च निकालकर वह दो से ढाई लाख रुपये सालाना आय अर्जित कर लेती हैं।

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हम बात कर रहे हैं हवालबाग ब्लॉक के चितई पंत गांव निवासी लता कांडपाल की। लता ने उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद बीएड की डिग्री प्राप्त की। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने अपना कॅरिअर बाड़ेछीना के निजी स्कूल में बतौर शिक्षिका शुरू किया। 15 वर्षों के अपने इस कॅरिअर में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को देख उनका मन पसीज जाता। क्षेत्र में बेरोजगारी समस्या को देख उन्होंने ग्रामीण परिवेश के लोगों को स्वराेजगार के लिए जागरूक करने की ठान ली।

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कलम छोड़ दी और कुदाल पकड़कर अपने बंजर हो रहे खेतों को हरा भरा करने में जुट गई। शुरुआत में उन्हें बाहर ही नहीं बल्कि परिजनों के उलाहनों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी मुहिम में जुटी रही। दो तीन साल तक बंजर हो रहे खेतों में पसीना बहाने के बाद वह अदरक, हल्दी, मशरूम, मूली, हरी सब्जियां, मटर, बींस उगाने में कामयाब हुई। धीरे धीरे उन्होंने गांव की कुछ महिलाओं को अपने साथ जोड़ा और उनके साथ मिलकर खेती के व्यवसाय को आगे बढ़ाती रही।

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खुद आर्थिक रूप से मजबूत बनी और गांव के लोगों को भी आजीविका का जरिया मिल गया। आज लता पूरे क्षेत्र में एक सफल काश्तकार के रूप में पहचानी जाती हैं। उनकी कामयाबी देख आसपास के गांवों के लोग भी अपने खेतों में पसीना बहा रहे हैं। लता की प्रेरणा से आज चितई पंत ही नहीं बल्कि चितई तिवारी, मन्योली, हवालबाग समेत अनेक गांवों के लोग फल और सब्जियों का उत्पादन कर अपनी आजीविका चला रहे हैं।

मिथक तोड़ा और मेहनत से बनाई पहचान
उच्च शिक्षित होने के बाद भी खेती को अपनाकर जहां लता ने एक मिथक तोड़ा, वहीं आज उनकी मेहनत उनकी पहचान बन गई है। वर्ष 2023 में गेल इंडिया के चेयरमैन आशुतोष कर्नाटक चितई पंत गांव पहुंचे और लता के खेती के तौर तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त की। इसी वर्ष दिल्ली न्याय अकादमी के 80 प्रशिक्षु और राज्य जैविक केंद्र मजखाली में प्रशिक्षण ले रहे यूपी के 40 किसानों के अलावा प्लस एप्रोच के सदस्य भी उनकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए उनके खेतों तक पहुंचे।

संगीत और कविता लेखन भी है रूचि
लता को संगीत और कविता लेखन से भी काफी लगाव है। लता वर्तमान में भातखंडे संगीत महाविद्यालय अल्मोड़ा से संगीत विशारद की शिक्षा ले रही हैं। जबकि उनकी लिखी कविताएं कई बार आकाशवाणी के विभिन्न स्टेशनों से भी प्रसारित हो चुकी हैं।

पिछले कुछ सालों तक हमारे खेत बंजर पड़े हुए थे। लेकिन लता कांडपाल ने हमें खेती के लिए प्रेरित किया और हमें उन्नत खेती के बारे में जानकारियां दी। आज हम अपने खेतों से अपने खाने के अलावा बाजार में बेचने के लिए फलों और सब्जियां का उत्पादन कर रहे हैं।


- चंद्रा पिलख्वाल, निवासी ग्राम मन्योली

लता कांडपाल ने हमें मशरूम उत्पादन के प्रशिक्षण के साथ ही जैविक तरीके से फल और सब्जियां बनाने का प्रशिक्षण दिया। आज इनके उत्पादन से ही हमारे परिवार की आजीविका चलती है। हमारे परिवार के सभी सदस्य अब अपने खेतों में तरह तरह की सब्जियों और फलों का उत्पादन कर रहे हैं।
- गाेविंदी देवी, निवासी ग्राम सिराड़

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