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चौबटिया में संरक्षित प्रिंस आफ चौबटिया सेब की रंगत भी गायब
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चौबटिया में बर्फवारी का नजारा। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : RANIKHET
रानीखेत (अल्मोड़ा)। चौबटिया में 1932 में स्थापित पर्वतीय फल शोध केंद्र और आजादी के बाद का उद्यान निदेशालय भले ही वर्तमान में बुरे दौर से गुजर रहा हो, लेकिन कभी वैज्ञानिकों की खोज रही सेब की प्रिंस ऑफ चौबटिया प्रजाति ने देश ही नहीं विदेशों में भी रंगत बिखेरी थी। अब इस प्रख्यात प्रजाति की रंगत भी गार्डन से गायब हो गई है, यह प्रजाति यहीं संरक्षित हुई थी। इस प्रजाति की खासियत यह थी कि एक सेब का वजन ही पाव भर होता था। विभाग अब इस प्रजाति के संरक्षण में जुटा हुआ है।
ब्रिटिश शासकों ने पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के उत्पादन की जानकारी देने के उद्देश्य से 1932 में चौबटिया में पर्वतीय फल शोध केंद्र की स्थापना की थी। 1953 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने पर्वतीय विकास का सपना देखा और यहां मालरोड में उद्यान विभाग का निदेशालय फल उपयोग विभाग उत्तर प्रदेश की स्थापना की। 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार ने निदेशालय का भवन चौबटिया में बनाने का निर्णय लिया और 1992 में यह भवन बनकर तैयार हो गया। यह निदेशालय उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग यूपी के नाम से जाना जाता है। यहां वैज्ञानिकों की लंबी चौड़ी फौज थी।
यह उद्यान गार्डन सेब के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा। यहां किंग डेविड, विंटर बनाना, गोल्डन डेलीसेस, बर्किंघम, रेड गोल्ड, गोल्डन वैली जैसी सेब की प्रजातियां थीं, इन प्रजातियों को अंग्रेज विदेश से अपने साथ लाए थे। चौबटिया गार्डन की खास उपलब्धि थी यहां उत्पादित प्रिंस ऑफ चौबटिया की प्रजाति।
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बागवान संगठन के जिलाध्यक्ष प्रेम गिरि गोस्वामी बताते हैं कि तब यहां डॉ. जीएन सेठ निदेशक थे, उन्हीं के निर्देशन में वैज्ञानिकों ने इस खास प्रजाति का उत्पादन किया था। स्वाद में यह सेब काफी मीठा और आकार में पावभर का होता था। लेकिन अब गार्डन में यह प्रजाति भी लुप्त होने की कगार पर है। सिर्फ दो पेड़ बचे हैं। जिनमें उत्पादन भी काफी कम होता है। इस प्रजाति को संरक्षित करने के प्रयास चल रहे हैं।
मेट्रोलॉजी आब्जर्वेट्री भी हुई बंद
राज्य बनने के बाद प्रदेश का यह निदेशालय प्रगति नहीं कर सका। राज्य बनने से पहले तक चौबटिया में उद्यान, प्लांट ब्रीडिंग, भू रसायन, प्लांट पैथोलॉजी, एंटोमोलॉजी, प्लांट फिजियोलॉजी, मशरूम, कला एवं प्रचार प्रसार के लिए कई शोधरत अनुभाग थे। इस केंद्र में एक मेट्रोलॉजी आब्जर्वेट्री भी स्थापित की गई थी। इससे पाला, ओला पड़ने या आंधी आने की सटीक जानकारी मिल जाती थी। शोध केंद्र बंद होने के साथ ही यह सब भी बंद हो गए हैं।
प्रिंस ऑफ चौबटिया सेब खाने में बहुत स्वादिष्ट और आकार में पाव भर का होता था। अब इसके पेड़ उम्र पूरी कर चुके हैं। एक दो पेड़ बचे हैं जिनकी उम्र भी 40 से 50 साल हो चुकी है। पहले इन पेड़ों पर पांच-पांच क्विंटल सेब का उत्पादन होता था। अब यह प्रजाति भी अंतिम चरण में है। अब विंटर बनाना, रॉयल डेलीसेस, बर्किंघम सहित 35-35 पुरानी प्रजातियों को संरक्षित करने के प्रयास चल रहे हैं। -दामोदर जोशी, ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक, राजकीय उद्यान चौबटिया।
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ब्रिटिश शासकों ने पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के उत्पादन की जानकारी देने के उद्देश्य से 1932 में चौबटिया में पर्वतीय फल शोध केंद्र की स्थापना की थी। 1953 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने पर्वतीय विकास का सपना देखा और यहां मालरोड में उद्यान विभाग का निदेशालय फल उपयोग विभाग उत्तर प्रदेश की स्थापना की। 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार ने निदेशालय का भवन चौबटिया में बनाने का निर्णय लिया और 1992 में यह भवन बनकर तैयार हो गया। यह निदेशालय उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग यूपी के नाम से जाना जाता है। यहां वैज्ञानिकों की लंबी चौड़ी फौज थी।
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यह उद्यान गार्डन सेब के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा। यहां किंग डेविड, विंटर बनाना, गोल्डन डेलीसेस, बर्किंघम, रेड गोल्ड, गोल्डन वैली जैसी सेब की प्रजातियां थीं, इन प्रजातियों को अंग्रेज विदेश से अपने साथ लाए थे। चौबटिया गार्डन की खास उपलब्धि थी यहां उत्पादित प्रिंस ऑफ चौबटिया की प्रजाति।
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बागवान संगठन के जिलाध्यक्ष प्रेम गिरि गोस्वामी बताते हैं कि तब यहां डॉ. जीएन सेठ निदेशक थे, उन्हीं के निर्देशन में वैज्ञानिकों ने इस खास प्रजाति का उत्पादन किया था। स्वाद में यह सेब काफी मीठा और आकार में पावभर का होता था। लेकिन अब गार्डन में यह प्रजाति भी लुप्त होने की कगार पर है। सिर्फ दो पेड़ बचे हैं। जिनमें उत्पादन भी काफी कम होता है। इस प्रजाति को संरक्षित करने के प्रयास चल रहे हैं।
मेट्रोलॉजी आब्जर्वेट्री भी हुई बंद
राज्य बनने के बाद प्रदेश का यह निदेशालय प्रगति नहीं कर सका। राज्य बनने से पहले तक चौबटिया में उद्यान, प्लांट ब्रीडिंग, भू रसायन, प्लांट पैथोलॉजी, एंटोमोलॉजी, प्लांट फिजियोलॉजी, मशरूम, कला एवं प्रचार प्रसार के लिए कई शोधरत अनुभाग थे। इस केंद्र में एक मेट्रोलॉजी आब्जर्वेट्री भी स्थापित की गई थी। इससे पाला, ओला पड़ने या आंधी आने की सटीक जानकारी मिल जाती थी। शोध केंद्र बंद होने के साथ ही यह सब भी बंद हो गए हैं।
प्रिंस ऑफ चौबटिया सेब खाने में बहुत स्वादिष्ट और आकार में पाव भर का होता था। अब इसके पेड़ उम्र पूरी कर चुके हैं। एक दो पेड़ बचे हैं जिनकी उम्र भी 40 से 50 साल हो चुकी है। पहले इन पेड़ों पर पांच-पांच क्विंटल सेब का उत्पादन होता था। अब यह प्रजाति भी अंतिम चरण में है। अब विंटर बनाना, रॉयल डेलीसेस, बर्किंघम सहित 35-35 पुरानी प्रजातियों को संरक्षित करने के प्रयास चल रहे हैं। -दामोदर जोशी, ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक, राजकीय उद्यान चौबटिया।