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‘खेती पर निर्भरता कम होना पलायन का कारण’
Updated Sun, 18 Jun 2017 04:27 PM IST
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‘खेती पर निर्भरता कम होना पलायन का कारण’
अल्मोड़ा। कृषि विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने वनों का अत्यधिक दोहन होने और खेती पर लोगों की निर्भरता कम होने को पलायन का कारण बताया है। जीबी पंत संस्थान के वैज्ञानिकों ने संयुक्त प्रबंधन, सामूहिक सोच के माध्यम से इसे बचाने का आह्वान किया। उन्होंने कृषि को रोजगार से जोड़ने के लिए लोगों को प्रेरित करने पर भी जोर दिया।
विकास भवन में मुख्य विकास अधिकारी जेएस नागन्याल की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी में विचार रखते हुए जीबी पंत पर्यावरण हिमालयन संस्थान कोसी के वैज्ञानिक डा. आरसी सुंदरियाल ने कहा कि उत्तराखंड में केवल 14 प्रतिशत क्षेत्र में खेती होती है। वनों का अत्यधिक दोहन होने और वर्षा जल के उचित संरक्षण न होने के कारण पानी की कमी और अन्य कारणों से लोगों की खेती पर निर्भरता कम हो रही है। उन्होंने बताया कि इससे पलायन की समस्या बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रबंधन, सामूहिक सोच के माध्यम से इसे बचाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र मटेला के वैज्ञानिक डा. बीडी सिंह ने बताया कि मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाने के कारण मरुस्थल की समस्या बढ़ रही है। इसके बचाव के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक डा. राजेंद्र कुमार ने कृषि को रोजगार से जोड़ने की वकालत की। गोष्ठी में मौजूद किसान भुवन गिरि गोस्वामी, विपिन जोशी और हेमा देवी ने मरुस्थलीकरण के रोकथाम के लिए खाली जमीन पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों का रोपण करने और जल संचय के लिए चाल-खाल का निर्माण और खेती के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए अधिक से अधिक जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करने को कहा। मुख्य विकास अधिकारी ने किसानों से वैज्ञानिकों विधियों से खेती कर जल संचय के लिए पौध रोपण करने को कहा। मुख्य कृषि अधिकारी प्रियंका सिंह ने बताया कि किसानों को समय-समय पर किसान मेलों और विभागीय कार्यक्रमों के द्वारा वैज्ञानिक विधि से खेती करने के लिए प्रेरित किया जाता है। बैठक में पशुपालन, चाय विकास बोर्ड, जल निगम, जल संस्थान, मत्स्य, रेशम, ग्राम्य विकास आदि विभागों के अधिकारियों ने भी भाग लिया।
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अल्मोड़ा। कृषि विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने वनों का अत्यधिक दोहन होने और खेती पर लोगों की निर्भरता कम होने को पलायन का कारण बताया है। जीबी पंत संस्थान के वैज्ञानिकों ने संयुक्त प्रबंधन, सामूहिक सोच के माध्यम से इसे बचाने का आह्वान किया। उन्होंने कृषि को रोजगार से जोड़ने के लिए लोगों को प्रेरित करने पर भी जोर दिया।
विकास भवन में मुख्य विकास अधिकारी जेएस नागन्याल की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी में विचार रखते हुए जीबी पंत पर्यावरण हिमालयन संस्थान कोसी के वैज्ञानिक डा. आरसी सुंदरियाल ने कहा कि उत्तराखंड में केवल 14 प्रतिशत क्षेत्र में खेती होती है। वनों का अत्यधिक दोहन होने और वर्षा जल के उचित संरक्षण न होने के कारण पानी की कमी और अन्य कारणों से लोगों की खेती पर निर्भरता कम हो रही है। उन्होंने बताया कि इससे पलायन की समस्या बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रबंधन, सामूहिक सोच के माध्यम से इसे बचाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र मटेला के वैज्ञानिक डा. बीडी सिंह ने बताया कि मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाने के कारण मरुस्थल की समस्या बढ़ रही है। इसके बचाव के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक डा. राजेंद्र कुमार ने कृषि को रोजगार से जोड़ने की वकालत की। गोष्ठी में मौजूद किसान भुवन गिरि गोस्वामी, विपिन जोशी और हेमा देवी ने मरुस्थलीकरण के रोकथाम के लिए खाली जमीन पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों का रोपण करने और जल संचय के लिए चाल-खाल का निर्माण और खेती के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए अधिक से अधिक जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करने को कहा। मुख्य विकास अधिकारी ने किसानों से वैज्ञानिकों विधियों से खेती कर जल संचय के लिए पौध रोपण करने को कहा। मुख्य कृषि अधिकारी प्रियंका सिंह ने बताया कि किसानों को समय-समय पर किसान मेलों और विभागीय कार्यक्रमों के द्वारा वैज्ञानिक विधि से खेती करने के लिए प्रेरित किया जाता है। बैठक में पशुपालन, चाय विकास बोर्ड, जल निगम, जल संस्थान, मत्स्य, रेशम, ग्राम्य विकास आदि विभागों के अधिकारियों ने भी भाग लिया।
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