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फसल कटने बाद गेहूं के अवशेष को आग लगाने जमीन की उर्वरा शक्ति होती कम
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गरुड़(बागेश्वर)। किसानों द्वारा गेहूं की फसल काटने के बाद के खेतों में आग लगाने से समूची कत्यूर घाटी में पर्यावरण प्रदूषित हो गया है। वन विभाग और कृषि पंडितों ने काश्तकारों ने खेतों में आग न लगाने की अपील की है। उनका कहना है कि खेतों में आग लगाने से जमीन उर्वरा शक्ति कम होती है।
कत्यूर घाटी के अधिकांश गांवों के किसान गेहूं की बालियां काटने के बाद खेतों में बचे अवशेष पर आग लगा देते हैं। कभी कभी खेतों की आग जंगल तक पहुंच जाती है। इस बीच किसानों ने गेहूं की बालियां काटने के बाद खेतों में आग लगा दी है। आग का धुएं से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। काश्तकारों का कहना है कि गेहूं की बालियां काटने के बाद अवशेष कोई काम नहीं आता है। जिसे वह खेतों में जला देते हैं। सेवानिवृत्त कृषि विकास अधिकारी गिरीश खोलिया का कहना है कि खेतों में आग लगाने से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। ब्यूरो
कत्यूर घाटी के अधिकांश गांवों के किसान गेहूं की बालियां काटने के बाद खेतों में बचे अवशेष पर आग लगा देते हैं। कभी कभी खेतों की आग जंगल तक पहुंच जाती है। इस बीच किसानों ने गेहूं की बालियां काटने के बाद खेतों में आग लगा दी है। आग का धुएं से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। काश्तकारों का कहना है कि गेहूं की बालियां काटने के बाद अवशेष कोई काम नहीं आता है। जिसे वह खेतों में जला देते हैं। सेवानिवृत्त कृषि विकास अधिकारी गिरीश खोलिया का कहना है कि खेतों में आग लगाने से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। ब्यूरो
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