दवाओं को महंगाई का कैंसर: इलाज के लिए गिरवी रखनी पड़ी जमीन, 26 हजार का इंजेक्शन निजी अस्पताल में 60 हजार का
कैंसर की महंगी दवाओं के चलते मरीजों के परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। जो इंजेक्शन बाजार में 26 हजार का मिल रहा है, वह निजी अस्पताल में 60 हजार का है। ऐसे में वाराणसी में एक महिला को इलाज के लिए अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ी।
विस्तार
निजी अस्पतालों में कैंसर की दवाएं महंगी मिल रही हैं। बाजार में जो इंजेक्शन 26 हजार रुपये में मिलता है उसकी कीमत निजी अस्पताल में 60 हजार रुपये है। चितईपुर क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में इलाज करा रही रोहनिया की महिला को जमीन गिरवी रखनी पड़ी है। उसे पांच दिन में ही इंजेक्शन के लिए तीन लाख रुपये का भुगतान करना पड़ा है।
कैंसर की महंगी दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। यह चिंता हमारी पड़ताल में सही मिली है। पड़ताल से पता चला कि दवाओं में ही महंगाई का कैंसर हो गया है। इस पर ड्रग विभाग कार्रवाई नहीं कर रहा है। विभाग का तर्क है कि दवाओं की एमआरपी से ज्यादा दाम वसूलने पर कार्रवाई की जाती है। निजी अस्पतालों में जो दवाएं मिलती हैं उसकी एमआरपी ही ज्यादा होती है। जो दवा बाजार में 500 रुपये में मिलती है, उसकी कीमत निजी अस्पतालों में 2000 रुपये है।
हर सप्ताह 50 मरीजों में कैंसर की पुष्टि
स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक, बीएचयू, महामना कैंसर अस्पताल समेत अन्य निजी अस्पतालों में हर सप्ताह 50 मरीजों में कैंसर की पुष्टि होती है। इन सबको महंगी दवाइयां खरीदने पड़ते हैं। इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं। कीमोथेरेपी पर भी ज्यादा खर्च होता है।
| दवा का नाम | बाजार में कीमत | निजी अस्पतालों में एमआरपी |
| सिस्प्लैटिन इंजेक्शन | 315 | 1200 |
| पैलीटैक्सेल कैप्सूल | 270 | 1100 |
| इमैटिनिब टेबलेट | 260 | 950 |
| ट्रास्टुजुमैब इंजेक्शन | 26000 | 60000 |
| टेमोक्सीफेन टेबलेट | 20 | 70 |
| 5-फ्लूरोयूरासिल इंजेक्शन | 22 | 60 |
| लेट्रोजोल टेबलेट | 120 | 300 |
| बेवाकिजुमैब टेबलेट | 90 | 190 |
नोट - सभी दवाओं की कीमतें रुपये में हैं। इंजेक्शन की कीमत प्रति पीस और टैबलेट की कीमत प्रति स्ट्रिप में दिखाई गई है।
केस -1: 1.30 लाख के इंजेक्शन के लिए 5 लाख देने पड़ गए
रोहनिया की एक महिला को चितईपुर के एक निजी अस्पताल में स्तन कैंसर की पुष्टि हुई। डॉक्टर ने ट्रास्टुजुमैब इंजेक्शन और पैलीटैक्सेललिखी। निजी अस्पताल ने बाहर से दवा मंगाने पर रोक लगा दी। खुले बाजार में 26 हजार में मिलने वाला ट्रास्टुजुमैब इंजेक्शन अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर 60 हजार रुपये एमआरपी पर मिला। 5 बार में इंजेक्शन का बिल 3 लाख पहुंच गया। बाजार से यही इंजेक्शन 1.30 लाख रुपये में मिल जाता।
केस - 2: ब्लड कैंसर में लंबे इलाज का वित्तीय संकट
अमरा क्षेत्र के एक व्यक्ति को ब्लड कैंसर है। अर्दली बाजार क्षेत्र के निजी अस्पताल के डॉक्टर ने इमैटिनिब टैबलेट नियमित रूप से लेने की सलाह दी । बाजार में यह टैबलेट 260 रुपये में उपलब्ध मिलता है, लेकिन निजी नर्सिंग होम की फार्मेसी से 950 रुपये की एमआरपी के साथ मिला। इससे खर्च तीन गुना बढ़ गया।
दवा निर्माता कंपनियां निजी अस्पतालों के साथ सांठगांठ कर जानबूझकर पैकेजिंग पर लागत से तीन से चार गुना अधिक एमआरपी प्रिंट करती हैं। निजी अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी इसी भारी एमआरपी का फायदा उठाकर मरीजों से पूरी कीमत वसूलती हैं। जब तक सरकार कैंसर और जीवन रक्षक दवाओं के ट्रेड मार्जिन और एमआरपी पर सख्त मूल्य सीमा लागू नहीं करेगी, तब तक यह खेल बंद नहीं होगा। -संजय सिंह, महामंत्री, दवा विक्रेता समिति, वाराणसी
मरीजों को अस्पताल की ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए बाध्य करना पूरी तरह अनुचित है। किसी भी मरीज या तीमारदार को बाहर के अधिकृत मेडिकल स्टोर से सस्ती या जेनेरिक दवाएं खरीदने की पूरी स्वतंत्रता है। यदि कोई निजी अस्पताल या नर्सिंग होम मरीजों पर अपने यहां से ही दवा लेने का अनुचित दबाव बनाता है, तो पीड़ित सीधे सीएमओ कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं। जांच में दोषी पाए जाने वाले अस्पतालों के खिलाफ क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. एनपी सिंह, सीएमओ