सत्ता बदलते ही सोनभद्र में खनन बेल्ट और वीआईपी सिंडिकेट पर कसा शिकंजा
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सूबे में सत्ता परिवर्तन होते ही खनन बेल्ट और वीआईपी सिंडिकेट पर शिकंजा कसना शुरू हो गया है। जिलाधिकारी ने गिट्टी परिवहन के नाम पर तय धनराशि से वीआईपी वसूली बंद करा दी है।
खनिज मूल्य, टैक्स और खर्च आदि जोड़कर एक पन्ना परमिट का दाम 4500 पड़ता है जबकि सिंडिकेट प्रति पन्ना परमिट 6250 रुपये में पट्टेधारकों को देता था।
इनमें से 1750 रुपये वीआईपी के नाम पर लिए जाते थे। उधर, वीआईपी बंद होने से लखनऊ से लेकर जिले के सफेदपोश और कुछ अफसरों के होश उड़ गए हैं।
चूंकि प्रति परमिट के हिसाब से वसूले जाने वाले वीआईपी शुल्क से शासन से लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों में मैनेज करने में खर्च होता था। ऐसे कईयों की आमदनी बंद हो गई है।
परमिट के आधार पर गिट्टी और बालू लादने की मात्रा होती है निर्धारित
बसपा की सरकार में खनन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा तो सपा में गायत्री प्रजापति के समय में सिंडिकेट वीआईपी वसूला था। अमर उजाला ने चार मार्च को और 16 मार्च को अवैध वसूली का खुलासा किया था।
डीएम पीके उपाध्याय ने मामले को संज्ञान में लेकर जांच पड़ताल कराई तो पता चला कि सत्ता बदलने के बाद भी सिंडिकेट वीआईपी वसूली करा रहा है। 20 घनमीटर (800 घनफीट) गिट्टी परिवहन में एक पन्ना परमिट लगता है।
एक पन्ना परमिट का निर्धारित मूल्य और खर्च आदि जोड़कर करीब 45 सौ रुपये पड़ता है। मगर सिंडिकेट 6250 रुपये में परमिट पट्टेधारकों को देता था। इसमें से 1750 रुपये वीआईपी शुल्क भी शामिल था।
जिलाधिकारी ने खान विभाग को कड़े शब्दों में तय रेट पर ही पट्टाधारकों को परमिट देने को कहा है। ऐसा न होने पर कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी है।
जिले में गिट्टी और बालू परिवहन के लिए खान विभाग परमिट जारी करता है। इससे एमएम 11 कहते हैं। इसी परमिट के आधार पर गिट्टी और बालू लादने की मात्रा निर्धारित होती है मगर वीआईपी के खेल के चलते निर्धारित दाम से अधिक रुपये लिए जाते थे। वसूली जाने वाली धनराशि में शासन से लेकर स्थानीय स्तर के नेता आदि को मैनेज करने में खर्च होता है।