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तुलसीदास की 397वीं पुण्यतिथि पर तुलसीघाट पर हुए आयोजन

Thu, 09 Jul 2020 12:48 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 09 Jul 2020 12:48 AM IST
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varanasi tulsidas
वाराणसी। संवत सोलह सौ असी, असि गंग के तीर, श्रावण श्यामा तीज शनि, तुलसी तज्यो शरीर। भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की 397वीं पुण्यतिथि बुधवार को तुलसीघाट पर मनाई गई। कोरोना संक्रमण के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए नेमियों ने गोस्वामी तुलसीदास को नमन किया। भंडारे में श्रद्धाभाव के साथ प्रसाद ग्रहण किया।
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संवत 1680 में तुलसीदास ने अस्सी घाट के निकट देह त्याग किया था। उनकी स्मृति में तभी से भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। अखाड़े के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने प्रात:काल गुरुपीठ का सविधि पूजन किया। उसके बाद आरती एवं प्रसाद का वितरण भक्तों में किया गया। इस अवसर पर महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि आज सनातनधर्म यदि जन-जन तक व्याप्त है तो उसकी एकमात्र वजह परंपराओं का अक्षुण्य निर्वहन है। गोस्वामी तुलसीदास सिर्फ एक जनकवि नहीं थे अपितु समाज सुधारक भी थे। इस दौरान प्रो. विजय नाथ मिश्र, पुष्कर नाथ मिश्र, विजय बहादुर सिंह, अशोक पांडेय, विश्वनाथ यादव आदि उपस्थित रहे।
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पातालपुरी मठ के महंत बालक दास का कहना है कि अपनी रचनाओं को माता-पिता कहने वाले वे विश्व के प्रथम कवि थे। उनका बाल्यकाल विपरीत परिस्थितियों में गुजरा। माता की मृत्यु और पिता द्वारा अमंगलकारी समझकर त्याग दिए जाने पर नवजात तुलसी दासी चुनिया पर निर्भर रहे। दासी ने जब उनका साथ छोड़ दिया तो भूख मिटाने के लिए उन्हें घर-घर भटकना पड़ा। उन्हें अशुभ मानकर लोग अपना द्वार बंद कर लेते। पग-पग पर संघर्ष ने ही उनके अस्तित्व को बचाया। जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्वर होता है।
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