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श्रद्धांजलिः खामोश हो गया बनारसी ठुमरी के सुरों का एक युग
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Wed, 25 Oct 2017 12:28 PM IST
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गिरिजा देवी
- फोटो : FILE PHOTO
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सुरों की मलिका ठुमरी साम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी का मंगलवार की रात कोलकाता के बिड़ला मेमोरियल अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। चिकित्सकों ने दिल का दौरा पड़ने के बाद उनकी चेतना वापसी के लिए हरसंभव प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुए।
गिरिजा देवी 88 वर्ष की थीं। उनके निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत में लोच भरी पूरब अंग की गायकी के एक युग ने ठहराव ले लिया। अप्पा जी के चिरनिद्रा में लीन होने की सूचना मिलते ही देश-दुनिया के शास्त्रीय संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई।
शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में निष्णात गिरिजा देवी की गायकी में बनारस और सेनिया घराने की अदायगी का विशिष्ट माधुर्य, अपनी पारंपरिक विशेषताओं के साथ विद्यमान था।
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ध्रुपद, खयाल, टप्पा, तराना, सदरा और पारंपरिक लोक संगीत में होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन के अनूठे प्रदर्शनों के साथ ही उन्होंने ठुमरी के साहित्य का गहन अध्ययन और अनुसंधान भी किया। गिरिजा देवी ने कई रचनाओं को अपनी आवाज देकर भारतीय संगीत प्रेमियों को सुर, लय और ताल की नई बारीकियों से परिचित कराया था।
कोलकाता की अपनी संगीत एकेडमी में ही दो दिन पहले अप्पा जी को सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई थी। तब उन्होंने अस्पताल जाने से मना कर दिया था। लोगों के आग्रह पर चिकित्सक को दिखाने के बाद उनकी हालत में सुधार आ गया था।
मंगलवार की दोपहर उनके सीने में फिर तेज दर्द उठा और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। आनन-फानन में उनकी पुत्री मुन्नी देवी व अन्य शिष्याएं उनको अस्पताल ले गईं। वहां उन्हें आईसीयू में वेंटीलेटर पर रखा गया। रात 9:30 बजे उन्हें तेज दौरा पड़ा और सांस की गति ठहर गई।
चिकित्सकों के मुताबिक दिल का दौरा पड़ने से अप्पा जी की हालत बेकाबू हो गई। कोशिश बहुत की गई और आक्सीजन देने के साथ ही कार्डियक मसाज भी किया गया लेकिन जान नहीं बचाई जा सकी।
उनके निधन पर पद्मभूषण पं. राजन मिश्र, पं. साजन मिश्र, पं. छन्नूलाल मिश्र, पद्मश्री सोमा घोष, पं. शिवनाथ मिश्र, राजेश्वर आचार्य, प्रो. ऋत्विक सान्याल समेत संगीत जगत की हस्तियों ने गहरा शोक जताया है।
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गिरिजा देवी 88 वर्ष की थीं। उनके निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत में लोच भरी पूरब अंग की गायकी के एक युग ने ठहराव ले लिया। अप्पा जी के चिरनिद्रा में लीन होने की सूचना मिलते ही देश-दुनिया के शास्त्रीय संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई।
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शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में निष्णात गिरिजा देवी की गायकी में बनारस और सेनिया घराने की अदायगी का विशिष्ट माधुर्य, अपनी पारंपरिक विशेषताओं के साथ विद्यमान था।
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ध्रुपद, खयाल, टप्पा, तराना, सदरा और पारंपरिक लोक संगीत में होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन के अनूठे प्रदर्शनों के साथ ही उन्होंने ठुमरी के साहित्य का गहन अध्ययन और अनुसंधान भी किया। गिरिजा देवी ने कई रचनाओं को अपनी आवाज देकर भारतीय संगीत प्रेमियों को सुर, लय और ताल की नई बारीकियों से परिचित कराया था।
कोलकाता की अपनी संगीत एकेडमी में ही दो दिन पहले अप्पा जी को सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई थी। तब उन्होंने अस्पताल जाने से मना कर दिया था। लोगों के आग्रह पर चिकित्सक को दिखाने के बाद उनकी हालत में सुधार आ गया था।
मंगलवार की दोपहर उनके सीने में फिर तेज दर्द उठा और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। आनन-फानन में उनकी पुत्री मुन्नी देवी व अन्य शिष्याएं उनको अस्पताल ले गईं। वहां उन्हें आईसीयू में वेंटीलेटर पर रखा गया। रात 9:30 बजे उन्हें तेज दौरा पड़ा और सांस की गति ठहर गई।
चिकित्सकों के मुताबिक दिल का दौरा पड़ने से अप्पा जी की हालत बेकाबू हो गई। कोशिश बहुत की गई और आक्सीजन देने के साथ ही कार्डियक मसाज भी किया गया लेकिन जान नहीं बचाई जा सकी।
उनके निधन पर पद्मभूषण पं. राजन मिश्र, पं. साजन मिश्र, पं. छन्नूलाल मिश्र, पद्मश्री सोमा घोष, पं. शिवनाथ मिश्र, राजेश्वर आचार्य, प्रो. ऋत्विक सान्याल समेत संगीत जगत की हस्तियों ने गहरा शोक जताया है।
नियति ने तोड़ दिया आखिरी प्रस्तुति का वादा
गिरीजा देवी
ठुमरी गायिका पद्म विभूषण गिरिजा देवी जीवन के अंतिम समय तक सुरों के साथ रहीं। राग और बंदिश की साधना उनके लिए ओढ़ने बिछाने जैसा था। वह अपने निधन के कुछ घंटे पहले तक तबला सम्राट पं. किशन महाराज के जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित संगीत समारोह की तैयारी को लेकर फिक्रमंद थीं लेकिन शायद ईश्वर को ये मंजूर नहीं था।
29 अक्तूबर को पुणे में प. किशन महाराज की याद में आयोजित संगीत समारोह में ठुमरी गायिका को प्रस्तुति देनी थी। यह जानकारी मंगलवार की रात पद्मविभूषण पं. राजन मिश्र ने अमर उजाला से साझा की। उन्होंने बताया कि वह महीने भर से पं. किशन महाराज की याद में पुणे में होने वाले संगीत समारोह को लेकर उत्साहित थीं।
उस समारोह में गिरिजा देवी के साथ राजन मिश्र को प्रस्तुति देनी थी। इसके लिए हवाई जहाज को टिकट करा लिया गया था। राजन मिश्र ने बताया कि वह एक मात्र ऐसी कलाकार थीं जिनके भीतर संगीत पूजा के रूप में समाहित था। वह संगीत ये जुड़े किसी भी आग्रह को ठुकराती नहीं थी।
उनकी तबीयत खराब थी लेकिन जब उनके सामने प्रस्ताव आया कि पं. किशन महाराज की याद में संगीता समारोह आयोजित किया गया है तो उन्होंने मुस्कुराते हुए राजन मिश्र से कहा था कि ईश्वर पता नहीं क्या करेगा।
जीवन का कोई ठीक नहीं लेकिन वह कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। टिकट करा दीजिए वह कार्यक्रम में खास ठुमरी पेश करेंगी। इसके लिए वह तैयारी भी कर रही थीं लेकिन तीन दिन पहले अचानक बीमारी के चलते अस्पताल जाना पड़ा। अंतत: वह हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गईं।
पद्मश्री से पद्मविभूषण तक का सफर
गिरिजा देवी का जन्म आठ मई, 1929 को बनारस के जमींदार रामदेव राय के घर हुआ था। पारंपरिक ठुमरी को नए दौर में अपनी आवाज के जादू से नया मुकाम दिलाने वाली गिरिजा देवी को 1972 में केंद्र सरकार ने पद्मश्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था। गिरिजा देवी को संगीत नाटक अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया था।
29 अक्तूबर को पुणे में प. किशन महाराज की याद में आयोजित संगीत समारोह में ठुमरी गायिका को प्रस्तुति देनी थी। यह जानकारी मंगलवार की रात पद्मविभूषण पं. राजन मिश्र ने अमर उजाला से साझा की। उन्होंने बताया कि वह महीने भर से पं. किशन महाराज की याद में पुणे में होने वाले संगीत समारोह को लेकर उत्साहित थीं।
उस समारोह में गिरिजा देवी के साथ राजन मिश्र को प्रस्तुति देनी थी। इसके लिए हवाई जहाज को टिकट करा लिया गया था। राजन मिश्र ने बताया कि वह एक मात्र ऐसी कलाकार थीं जिनके भीतर संगीत पूजा के रूप में समाहित था। वह संगीत ये जुड़े किसी भी आग्रह को ठुकराती नहीं थी।
उनकी तबीयत खराब थी लेकिन जब उनके सामने प्रस्ताव आया कि पं. किशन महाराज की याद में संगीता समारोह आयोजित किया गया है तो उन्होंने मुस्कुराते हुए राजन मिश्र से कहा था कि ईश्वर पता नहीं क्या करेगा।
जीवन का कोई ठीक नहीं लेकिन वह कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। टिकट करा दीजिए वह कार्यक्रम में खास ठुमरी पेश करेंगी। इसके लिए वह तैयारी भी कर रही थीं लेकिन तीन दिन पहले अचानक बीमारी के चलते अस्पताल जाना पड़ा। अंतत: वह हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गईं।
पद्मश्री से पद्मविभूषण तक का सफर
गिरिजा देवी का जन्म आठ मई, 1929 को बनारस के जमींदार रामदेव राय के घर हुआ था। पारंपरिक ठुमरी को नए दौर में अपनी आवाज के जादू से नया मुकाम दिलाने वाली गिरिजा देवी को 1972 में केंद्र सरकार ने पद्मश्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था। गिरिजा देवी को संगीत नाटक अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया था।