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वाराणसी की पहचान का अस्तित्व खतरे में, वरुणा भी चल पड़ी असि की राह
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Fri, 15 Dec 2017 10:59 AM IST
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पीछे से नहीं आ रहा पानी, कॉरिडोर में दिख रहा है मलजल
- फोटो : अमर उजाला
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वाराणसी की पहचान से जुड़ी वरुणा नदी का भी अस्तित्व खतरे में है। पहले से ही पर्याप्त जलराशि के अभाव से जूझ रही वरुणा नदी भू-माफिया, नगर निगम और वीडीए की मिलीभगत के कारण भी असि नदी की राह पर चल पड़ी है। उच्चाधिकारियों की लापरवाही से वरुणा के डूब क्षेत्र में सैकड़ों अवैध निर्माण हो गए हैं। इन अवैध निर्माणों ने न सिर्फ वरुणा के प्रवाह को बाधित किया है बल्कि शहर को भीषण बाढ़ के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। वरुणा किनारे अवैध निर्माण कराने वाले 762 भवन स्वामियों को वीडीए और 30 लोगों को सिंचाई विभाग ने डेढ़ साल पहले नोटिस दिया था। तब से कार्रवाई के नाम पर अब तक केवल रमाडा होटल का एक हिस्सा ही ढहाया गया है। इसके साथ ही अवैध निर्माण करने वालों की मदद के लिए जनप्रतिनिधि भी आगे आ गए हैं।
वरुणा नदी सूखने के कगार पर है। वरुणा नदी में पीछे से पानी नहीं आने से सैकड़ों गांवों के फसलों की सिंचाई का संकट खड़ा हो गया है। शहर क्षेत्र में वरुणा में दिखने वाला पानी मलजल है। नदी में पानी की कमी के लिए इसके प्राकृतिक स्वरूप से की गई छेड़छाड़ और मनमाने निर्माण जिम्मेदार है। भू-माफिया, नगर निगम, वीडीए और प्रशासनिक अधिकारियों के गठजोड़ से नदी के डूब क्षेत्र में अवैध निर्माणों की भरमार हो गई है। रही-सही कसर वरुणा कॉरिडोर की योजना पर काम शुरू कर अंजाम दी जा रही है।
राजस्व और सिंचाई विभाग के रिकार्ड में वरुणा किनारे से 40 से 80 मीटर तक का दायरा डूब क्षेत्र है। इसी बीच वरुणा कॉरिडोर की योजना लागू करने से पूर्व ड्रोन सर्वे के खुलासे के बाद भी अवैध निर्माण जस के तस हैं। वीडीए ने नदी के दोनों किनारों पर 50 मीटर के दायरे को ग्रीन बेल्ट घोषित कर यहां निर्माण करने पर पाबंदी लगा दी है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि डूब क्षेत्र में अतिक्रमण नगर निगम बनने के बाद हुआ।
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निगम बनने के बाद नदी किनारे की जमीन का मालिक सिंचाई विभाग के बजाय निगम हो गया। फिर जिला प्रशासन की अनदेखी से डूब क्षेत्र में जमीनों की रजिस्ट्री हो गई। नगर निगम ने दाखिल खारिज कर मकान नंबर एलाट कर दिया। बाद में वीडीए बनने पर भी अवैध निर्माणों पर ध्यान नहीं दिया गया। डूब क्षेत्र में अब तक सैकड़ों भवन, होटल और व्यावसायिक कांप्लेक्स अवैध ढंग से खड़े हो गए हैं।
जानकारों के मुताबिक वरुणा में पहले दिसंबर में पर्याप्त पानी रहता था। इसके बाद पानी कम होने पर ज्ञानपुर शीर्ष प्रखंड से पानी छोड़ा जाता था। इस बार पानी नहीं छोड़े जाने से नदी सूखने की कगार पर है। कहीं-कहीं तो केवल कीचड़ भर है।
सत्तनपुर, हिरमपुर, पांडेयपुर, जगपट्टी, परसीपुर, तेंदुई, रसूलपुर, चक्का, अवसानपुर, बलुआ, नेवादा, घुसपुर, सालिवाहनपुर, खेवली, कूड़ी, इसवार, खंडा, रामेश्वर सहित कई गांवों में फसलों की सिंचाई इसी नदी के सहारे होती थी। इस बार पानी कम होने से फसलों और सब्जियाें की खेती के लिए पानी नहीं मिल रहा है।
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वरुणा नदी सूखने के कगार पर है। वरुणा नदी में पीछे से पानी नहीं आने से सैकड़ों गांवों के फसलों की सिंचाई का संकट खड़ा हो गया है। शहर क्षेत्र में वरुणा में दिखने वाला पानी मलजल है। नदी में पानी की कमी के लिए इसके प्राकृतिक स्वरूप से की गई छेड़छाड़ और मनमाने निर्माण जिम्मेदार है। भू-माफिया, नगर निगम, वीडीए और प्रशासनिक अधिकारियों के गठजोड़ से नदी के डूब क्षेत्र में अवैध निर्माणों की भरमार हो गई है। रही-सही कसर वरुणा कॉरिडोर की योजना पर काम शुरू कर अंजाम दी जा रही है।
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राजस्व और सिंचाई विभाग के रिकार्ड में वरुणा किनारे से 40 से 80 मीटर तक का दायरा डूब क्षेत्र है। इसी बीच वरुणा कॉरिडोर की योजना लागू करने से पूर्व ड्रोन सर्वे के खुलासे के बाद भी अवैध निर्माण जस के तस हैं। वीडीए ने नदी के दोनों किनारों पर 50 मीटर के दायरे को ग्रीन बेल्ट घोषित कर यहां निर्माण करने पर पाबंदी लगा दी है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि डूब क्षेत्र में अतिक्रमण नगर निगम बनने के बाद हुआ।
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निगम बनने के बाद नदी किनारे की जमीन का मालिक सिंचाई विभाग के बजाय निगम हो गया। फिर जिला प्रशासन की अनदेखी से डूब क्षेत्र में जमीनों की रजिस्ट्री हो गई। नगर निगम ने दाखिल खारिज कर मकान नंबर एलाट कर दिया। बाद में वीडीए बनने पर भी अवैध निर्माणों पर ध्यान नहीं दिया गया। डूब क्षेत्र में अब तक सैकड़ों भवन, होटल और व्यावसायिक कांप्लेक्स अवैध ढंग से खड़े हो गए हैं।
जानकारों के मुताबिक वरुणा में पहले दिसंबर में पर्याप्त पानी रहता था। इसके बाद पानी कम होने पर ज्ञानपुर शीर्ष प्रखंड से पानी छोड़ा जाता था। इस बार पानी नहीं छोड़े जाने से नदी सूखने की कगार पर है। कहीं-कहीं तो केवल कीचड़ भर है।
सत्तनपुर, हिरमपुर, पांडेयपुर, जगपट्टी, परसीपुर, तेंदुई, रसूलपुर, चक्का, अवसानपुर, बलुआ, नेवादा, घुसपुर, सालिवाहनपुर, खेवली, कूड़ी, इसवार, खंडा, रामेश्वर सहित कई गांवों में फसलों की सिंचाई इसी नदी के सहारे होती थी। इस बार पानी कम होने से फसलों और सब्जियाें की खेती के लिए पानी नहीं मिल रहा है।
कचहरी और कमिश्नर आवास तक आ गया था पानी
दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ खेतों की सिंचाई पर संकट
- फोटो : अमर उजाला
रिकार्ड के अनुसार काशी में नौ सितंबर, 1978 को बाढ़ का स्तर 73.901 मीटर के उच्च बिंदु पर था। गोदौलिया, नई सड़क, लक्सा, लंका, सामने घाट तक गंगा के बाढ़ का पानी आ गया था। यहां नावें चल रही थी। इसी प्रकार वरुणा का पानी कचहरी स्थित स्टेट बैंक, कमिश्नर आवास, डीएम बंगला, जिला उद्यान कार्यालय, पीडब्ल्यूडी के पीछे वाले गेट से लेकर, नदेसर पेट्रोल पंप तक आ गया था। बाढ़ के दौरान इसी उच्च बिंदु तक डूबने वाली जगहों को डूब क्षेत्र कहते हैं। नियमानुसार यहां किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं हो सकता है।
वरुणा नदी और वरुणा कॉरिडोर
इलाहाबाद के मैनहन ताल से निकली वरुणा नदी 48 किमी लंबी है। नदी भदोही से वाराणसी में प्रवेश करती है। प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर डीएम बंगले के पीछे से सराय मोहाना तक 11.3 किमी में सिंचाई विभाग ने चैनलाइजेशन का काम शुरू कराया गया। 56 प्रतिशत काम हो चुका है। कॉरिडोर के तहत नदी के दोनों तरफ 50 मीटर तक ग्रीन बेल्ट घोषित कर दी गई है। किनारों पर पक्के घाट बनाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब वरुणा में पानी ही नहीं होगा, तो यहां आएगा कौन?
क्या कहते हैं विशेषज्ञ..
नदी वैज्ञानिक और बीएचयू के प्रोफेसर प्रो. यूके चौधरी ने कहा कि वरुणा कॉरिडोर तकनीकी रूप से सही नहीं है। प्राकृतिक ढाल बदलेंगे तो धारा बदलेगी। भूजल स्तर बदलेगा। ऐसी स्थिति में पानी की समस्या बनी रहेगी। नदी में पानी के लिए जरूरी है कि नदी का प्राकृतिक स्वरूप बरकरार रहे।
अधिशासी अभियंता सिंचाई विभाग आलोक जैन ने कहा किकॉरिडोर का काम चलने के कारण ज्ञानपुर पंप कैनाल से पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। 31 मार्च, 2018 तक निर्माण पूरा होने के बाद पानी भरा जाएगा। डूब क्षेत्र से कब्जा हटाने के लिए जिला प्रशासन, वीडीए और निगम को सूची दे दी गई है।
एडीएम वित्त एवं प्रभारी जिलाधिकारी मनोज कुमार राय वरुणा किनारे पूर्व में घोषित ग्रीन बेल्ट में अवैध निर्माण कैसे हुए और अब तक इसको लेकर कार्रवाई की जानकारी ली जाएगी। वीडीए और नगर निगम के अफसरों के साथ जल्दी ही बैठक कर कार्रवाई की रूपरेखा भी तय की जाएगी।
वरुणा नदी और वरुणा कॉरिडोर
इलाहाबाद के मैनहन ताल से निकली वरुणा नदी 48 किमी लंबी है। नदी भदोही से वाराणसी में प्रवेश करती है। प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर डीएम बंगले के पीछे से सराय मोहाना तक 11.3 किमी में सिंचाई विभाग ने चैनलाइजेशन का काम शुरू कराया गया। 56 प्रतिशत काम हो चुका है। कॉरिडोर के तहत नदी के दोनों तरफ 50 मीटर तक ग्रीन बेल्ट घोषित कर दी गई है। किनारों पर पक्के घाट बनाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब वरुणा में पानी ही नहीं होगा, तो यहां आएगा कौन?
क्या कहते हैं विशेषज्ञ..
नदी वैज्ञानिक और बीएचयू के प्रोफेसर प्रो. यूके चौधरी ने कहा कि वरुणा कॉरिडोर तकनीकी रूप से सही नहीं है। प्राकृतिक ढाल बदलेंगे तो धारा बदलेगी। भूजल स्तर बदलेगा। ऐसी स्थिति में पानी की समस्या बनी रहेगी। नदी में पानी के लिए जरूरी है कि नदी का प्राकृतिक स्वरूप बरकरार रहे।
अधिशासी अभियंता सिंचाई विभाग आलोक जैन ने कहा किकॉरिडोर का काम चलने के कारण ज्ञानपुर पंप कैनाल से पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। 31 मार्च, 2018 तक निर्माण पूरा होने के बाद पानी भरा जाएगा। डूब क्षेत्र से कब्जा हटाने के लिए जिला प्रशासन, वीडीए और निगम को सूची दे दी गई है।
एडीएम वित्त एवं प्रभारी जिलाधिकारी मनोज कुमार राय वरुणा किनारे पूर्व में घोषित ग्रीन बेल्ट में अवैध निर्माण कैसे हुए और अब तक इसको लेकर कार्रवाई की जानकारी ली जाएगी। वीडीए और नगर निगम के अफसरों के साथ जल्दी ही बैठक कर कार्रवाई की रूपरेखा भी तय की जाएगी।
वरुणा कॉरिडोर के औचित्य पर लगातार उठ रहे सवाल
वरुणा कॉरिडोर
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सपा सरकार में सीएम रहे अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट वरुणा कॉरिडोर की योजना लाई गई। नदी वैज्ञानिक इस पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका मानना है कि किसी भी नदी के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से उसके प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ता हैं। पक्का निर्माण कराने से भूजल के स्तर पर असर पड़ता है।
फिलहाल वरुणा नदी में मलजल है। इसे गोइठहां प्लांट तक ले जाने के लिए इंटरसेप्टर लाइन बिछाई जा रही है। नदी वैज्ञानिकों की मानें तो पक्का निर्माण कराने से अच्छा होता कि किनारों को दुरुस्त कर वहां पौधे लगा दिए जाते तो उसका प्राकृतिक स्वरूप बरकरार रहता और पेड़ों के चलते पानी भी टिका रहता।
वरुणा कॉरिडोर एक नजर में
201 करोड़ की वरुणा कॉरिडोर योजना
125 करोड़ रुपये मिले
76 करोड़ रुपये लैप्स होने से बचाने के लिए सिंचाई विभाग शासन को लौटाए
15 करोड़ रुपये की डिमांड की गई
56 प्रतिशत काम हुआ
44 प्रतिशत काम 31 मार्च 2018 तक करना है पूरा
फिलहाल वरुणा नदी में मलजल है। इसे गोइठहां प्लांट तक ले जाने के लिए इंटरसेप्टर लाइन बिछाई जा रही है। नदी वैज्ञानिकों की मानें तो पक्का निर्माण कराने से अच्छा होता कि किनारों को दुरुस्त कर वहां पौधे लगा दिए जाते तो उसका प्राकृतिक स्वरूप बरकरार रहता और पेड़ों के चलते पानी भी टिका रहता।
वरुणा कॉरिडोर एक नजर में
201 करोड़ की वरुणा कॉरिडोर योजना
125 करोड़ रुपये मिले
76 करोड़ रुपये लैप्स होने से बचाने के लिए सिंचाई विभाग शासन को लौटाए
15 करोड़ रुपये की डिमांड की गई
56 प्रतिशत काम हुआ
44 प्रतिशत काम 31 मार्च 2018 तक करना है पूरा