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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां: तीसरी-चौथी पीढ़ी ने शहनाई की धुन से पेश की खिराज-ए-अकीदत, खास बंदिशें; विरासत पर चर्चा

Sat, 22 Aug 2026 05:30 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sat, 22 Aug 2026 05:30 AM IST
सार

वाराणसी में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी के शहनाई वादकों ने सुरों की श्रद्धांजलि दी। शहनाई की मधुर धुनों से उस्ताद को खिराज-ए-अकीदत पेश किया गया। कार्यक्रम में कलाकारों ने उनकी संगीत परंपरा और विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। शहनाई की गूंज से माहौल भावपूर्ण हो गया।

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Ustad Bismillah Khan generations pay tribute through Shehnai melodies and special compositions
पेश की खिराज-ए-अकीदत। - फोटो : संवाद

विस्तार

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 20वीं बरसी पर शुक्रवार को दरगाह-ए-फातमान स्थित उस्ताद के मकबरे पर उनके मुरीदों ने अकीदत पेश की। दरगाह पर गुलपोशी की गई तो उनके पैतृक आवास पर शहनाई की धुन से खिराज-ए-अकीदत पेश की गई। 

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उनकी बरसी पर पहली बार उनके आवास पर तीसरी और चौथी पीढ़ी ने शहनाई बजाई। उनके पोते और परपोतों ने जब उस्ताद की चर्चित बंदिशें शहनाई पर बजाईं तो हर किसी ने उस्ताद को नमन करते हुए उनकी बढ़ती विरासत पर खुशी जताई।
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शुक्रवार को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के दरगाह-ए-फातमान स्थित मकबरे पर सुबह कुरानख्वानी और दुआख्वानी हुई। उनके परिवार के अलावा कुछ कलाकार उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के पुत्र शांतनु राय ने मकबरे पर पुष्प चढ़ाकर नमन किया। 

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इस दौरान उस्ताद के साथ पांच दशक तक दुक्कड़ पर संगतकार रहे बसारत हुसैन के बेटे जाकिर हुसैन और उस्ताद के पोते आफाक हैदर ने शहनाई पर मातमी धुन पेश की। उन्होंने उस्ताद के चर्चित नौहे मारा गया तीर से बच्चा रबाब का..., रो-रो के कहती थी जहरा... की धुन जब शहनाई पर पेश की तो सभी की आंखें नम हो गईं। मकबरे पर दोपहर तक उनके चाहने वाले पहुंचकर गुलपोशी करते रहे।

वहीं, शाम को उस्ताद के हड़हासराय स्थित पैतृक आवास पर लंबे समय बाद विरासत-ए-बिस्मिल्लाह कार्यक्रम हुआ। जाकिर हुसैन के साथ उस्ताद के पोते अरशद अब्बास, परपोते गाजी अब्बास, जैन अब्बास और मोहम्मद हुसैन ने शहनाई पेश कर सांगीतिक नमन किया। 

उन्होंने उस्ताद की उन सभी बंदिशों को शहनाई पर साधा, जिसे वे देश-विदेश में बजाते थे। उनकी प्रसिद्ध धुन रघुपति राघव राजाराम... भी पेश किया। इसके बाद राग मधुवंती में तीनताल की बंदिश को विस्तार दिया। इसके बाद उस्ताद की पसंदीदा कजरी मिर्जापुर कईला गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइला बलमू... की धुन पेश की। 

दुक्कड़ पर मो. सैफ ने संगत की। संयोजन आफाक हैदर व शकील अहमद जादूगर ने किया। मकबरे पर अकीदत पेश करने वालों में शहनाई वादक महेंद्र प्रसन्ना, अजादार हुसैन, हादी हुसैन के अलावा उस्ताद की बेटी जरीना बेगम, पोती मिनहाज फातमा, शिफा, प्रमोद वर्मा आदि रहे।

काशी को भारत रत्न दिलाने वाले उस्ताद को नेताओं-अधिकारियों ने भुला दिया
शहनाई के जरिये दुनिया भर में काशी को पहचान दिलाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बरकी पर उनके मकबरे पर कोई अधिकारी व नेता नहीं पहुंचा। आफाक हैदर ने कहा कि जब दादा जी थे तो देशभर के नेता और नामचीन लोग उनसे मिलने के लिए परेशान रहते थे।

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