वाराणसी: सरकारी नौकरी के नाम पर ठगने वाले गिरोह का एक और जालसाज गिरफ्तार, एसटीएफ की पूछताछ में बड़ा खुलासा
नौकरी दिलाने का झांसा देकर बेरोजगारों को ठगने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का एसटीएफ वाराणसी इकाई ने भंडाफोड़ किया था। गिरोह के एक और जालसाज को एसटीएफ ने पटना से गिरफ्तार किया है।
विस्तार
भारतीय सेना, रेलवे सहित अन्य सरकारी विभागों में नौकरी दिलाने का झांसा देकर युवाओं से ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का एक और जालसाज गिरफ्तार हुआ है। एसटीएफ वाराणसी इकाई ने पटना के रामकृष्णनगर से आरोपी को दबोचा। पूछताछ में आरोपी ने एसटीएफ को कई अहम जानकारियां दी है।
एसटीएफ वाराणसी इकाई के अपर पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार सिंह के अनुसार आर्मी इंटेलिजेंस की सूचना पर 20 फरवरी को अंतरराज्यीय गिरोह के सरगना सहित तीन जालसाजों को गिरफ्तार कर मामले का खुलासा किया गया था।
पटना से पकड़ा गया आरोपी
आरोपियों से पूछताछ में सामने आया कि पटना के कृष्णनगर निवासी आलोक उर्फ विजय भी इस गिरोह में शामिल है। उस पर सिगरा थाने में मुकदमा भी दर्ज है। इस आधार पर वाराणसी यूनिट के निरीक्षक अनिल कुमार सिंह के नेतृत्व में गठित टीम आरोपी की गिरफ्तारी को लेकर दबिश दे रही थी।
आरोपी आलोक उर्फ विजय कुमार के बारे में सूचना मिली कि वह बिहार पटना के कृष्णा नगर थाना अंतर्गत आदर्श कॉलोनी रोड नंबर-1 में रह रहा है। घेराबंदी करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
बनारस में आठ लोगों से धोखाधड़ी
एसटीएफ की पूछताछ में आरोपी आलोक उर्फ विजय कुमार ने बताया कि अंतराज्यीय गिरोह का सरगना अजीत प्रताप सिंह उर्फ अमन है। योजना के तहत वर्ष 2007 से नौकरी दिलाने के नाम पर जालसाजी करने का काम कर रहे हैं। वर्ष 2019 में वाराणसी में 8 लोगों से नौकरी दिलाने के नाम पर 41 लाख रुपये लिए थे।
सिगरा थाने में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होने के बाद गिरोह सहित वाराणसी छोड़कर भुवनेश्वर और हैदराबाद में ऑफिस खोलकर दक्षिण भारत के काफी अभ्यर्थियों से नौकरी दिलाने के नाम पर जालसाजी कर रहे थे।
दो से तीन माह का देते थे प्रशिक्षण और वेतन
एसटीएफ की पूछताछ में जालसाज ने बताया कि वह संबंधित विभाग के कार्यालय के परिसर के पास किराए पर कमरा लेकर वहां इन अभ्यर्थियों को दो-तीन माह का प्रशिक्षण कराते थे और इसके बाद अभ्यर्थियों के बैंक खाते में इन्हीं के पूर्व में लिये गये पैसे में से तीन माह तक 25-25 हजार रुपये वेतन के नाम पर भेजते थे।
इससे इन अभ्यर्थियों को यह आभास होता था कि उनकी वास्तव में नौकरी मिल गयी है और ये अभ्यर्थी अपने परिचित अन्य अभ्यर्थियों को इनसे मिलवा देते थे। इस तरह से जब ठगी से काफी पैसा एकत्रित हो जाता था, तब यह गायब हो जाते थे।