अनूप जलोटा के सुरों पर तन-मन झंकृत
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शुरूआत में पंडित रतिकांत महापात्रा और सुजाता महापात्रा के ओडिसी नृत्य से शिववंदना के बाद हनुमान वंदना। हनुमान के बालरूप से लेकर सीता खोज से लंका दहन, हिमालय पर्वत से संजीवनी बूटी लाने तक के भाव को नृत्य में जीवंत किया। इनके साथ शुचि, प्रज्ञा, रितू, शिप्रा ने नृत्य में साथ दिया। इनके बाद विख्यात ठुमरी गायिका पद्मविभूषण गिरिजा देवी ने मंच संभाला। इन्होंने राग केदार में निबद्ध विलंबित एक ताल की बंदिश-जोगिया मन भाए...। इसी राग में छोटा ख्याल की दूसरी बंदिश चांदनिया न सुहाए...। तीन ताल में प्रस्तुत किया। इसके बाद राग मिश्र खमाज में बनारस अंग की ठुमरी छवि दिखला जा बांके संवरिया रे...। इसके बाद इन्होंने राग दीपचंदी में दादरा की बंदिश सावन के बरस आए... की प्रस्तुति की। अंत में भजन के बोल भरत भाई कपि से उरूण हम नाहीं... की प्रस्तुति कर इन्होंने विदा ली। तबले पंडित समर शाहा, हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र और सारंगी पर पंडित कन्हैयालाल मिश्र ने संगत की।
इनके बाद नीता पंडित ने राग शंकरा में सोलह मात्रा में निबद्ध तीन ताल की बंदिश के बाद तराना और फिर भजन प्रस्तुत किया। इनके बाद जानेमाने सितार वादक निलाद्री कुमार ने सितार पर स्वरों के समन्वय और अनूठे
प्रयोगों से संगीत प्रेमियों के दिल पर साधना की छाप छोड़ी। इन्होंने राग जैजैवंती की अवतारणा की। इसके बाद राजतिलक कामोद में बंदिश में अलाप जोड़ झाला के बाद गतों पर बेजोड़ चयनदारी प्रस्तुत किया। फिर उन्होंने एक धुन बजाकर विदा ली। तबले पर संगत किया पद्मश्री पंडित घाटे ने। भजन सम्राट पद्मश्री अनूप जलोटा ने ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन, वो तो गली-गली हरि गुन गाने लगी.. से शुरूआत की। उपस्थित भीड़ तालियों के साथ उनके सुर में सुर मिलाती रही। लोग जहां-तहां झूमते थिरकते रहे।