वाराणसी। काशी में वर्षा सिर्फ एक ऋतु नहीं, बल्कि स्मृति, विरह, मिलन और काव्य की पूरी परंपरा है। इसी परंपरा को चित्रों के जरिए सामने लाने वाली प्रदर्शनी ‘पावस’ इन दिनों नागरीप्रचारिणी सभा में सजी है। खास बात यह है कि जिन चित्रों को यहां प्रदर्शित किया गया है, उनकी कहानी भी इसी भवन से जुड़ी है। करीब एक सदी पहले इसी सभा की छत के नीचे भारत कला भवन ने आकार लिया था। ऐसे में ‘पावस’ सिर्फ एक कला प्रदर्शनी नहीं, बल्कि अपनी ही सांस्कृतिक विरासत की घर वापसी भी है। यह बातें विद्यार्थियों को प्रदर्शनी दिखाने के दौरान नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कही।
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री ने बताया कि प्रदर्शनी में अठारहवीं शताब्दी की गुलेर-कांगड़ा शैली की नायिका से लेकर आधुनिक कलाकारों की कृतियों तक वर्षा के अलग-अलग भाव दिखाई देते हैं। कहीं आषाढ़ के बादलों को निहारती नायिका है तो कहीं कालिदास के ‘मेघदूत’ का विरह। गुलेर, कांगड़ा, पहाड़ी, बसोहली, बीकानेर, मेवाड़, दक्कनी और प्रांतीय मुगल शैलियों के चुनिंदा लघुचित्रों के साथ बारहमासा, रागमाला, नायिका-भेद और मेघ-मल्हार की परंपरा भी प्रदर्शनी में दिखाई गई है। यह आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजित कुमार चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में भारत कला भवन के निदेशक प्रोफेसर श्रीरूप रायचौधुरी, उप निदेशक डॉ. निशांत, समन्वयक दीपक भरथन आलाथूर, असिस्टेंट क्यूरेटर डॉ. डी.बी. सिंह और डॉ. प्रियंका सिंह के सहयोग से हुआ।