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Varanasi News: धर्मसम्राट करपात्री महाराज के नाम में ही समाहित हैं उनके विचार

Sun, 27 Jul 2025 01:38 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 27 Jul 2025 01:38 AM IST
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The name of Dharma Samrat Karpatri Maharaj itself contains his thoughts
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के नाम और उनके संदेश में ही उनके सर्वस्व विचार समाहित हैं। जिसने उनके विचारों को ग्रहण किया उसका जीवन धन्य हो गया। धर्मसम्राट ने जो नारे (उद्घोष) दिए वह आज विश्व कल्याण के लिए मूलमंत्र बन चुके हैं। उनके दिए हुए संदेश को ग्रहण कर हम अपने जीवन को आनंदित कर सकते हैं। उक्त विचार मुख्य अतिथि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नीरज तिवारी ने शनिवार को दुर्गाकुंड के श्रीधर्मसंघ शिक्षा मंडल के प्रांगण में आयोजित करपात्र प्राकट्य दिवस के पर करपात्र रत्न समारोह में व्यक्त किया।
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कार्यक्रम में वेदांत और मीमांसा के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय मणि द्रविण शास्त्री को करपात्र रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। इसमें सवा लाख रुपये का ड्राफ्ट, प्रशस्ति पत्र, श्रीफल और दुशाला प्रदान किया गया। साथ ही करपात्र गौरव सम्मान बीएचयू के संस्कृत विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. उपेंद्र पांडेय को प्रदान किया गया। उन्हें सम्मान स्वरूप 51 हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र, श्रीफल और दुशाला दिया गया। धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी, न्यायमूर्ति नीरज तिवारी ने सम्मान दिया। आचार्यों और बटुकों के चारों वेदों के मंगलाचरण से शुभारंभ हुआ। इसके बाद अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर धर्मसम्राट के चित्र पर माल्यार्पण किया। 14 दिवसीय प्राकट्योत्सव के छठें दिन अध्यक्षता करते हुए स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने कहा कि धर्मसम्राट का पूरा जीवन मंदिरों की मर्यादा, शास्त्रों और गोमाता की रक्षा के लिए समर्पित रहा। उनके विचार सूर्य के समान हमेशा इस संसार को प्रकाशित करते रहेंगे। सनातन धर्म के प्रति स्वामी जी द्वारा स्थापित धर्मसंघ सदैव समर्पित रहेगा।
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विशिष्ट वक्ता करपात्र रत्न से अलंकृत महामहोपाध्याय मणि द्रविड़ शास्त्री ने कहा कि स्वामी करपात्री के उपदेश देश के जन-जन में आंतरिक परिवर्तन करने में सक्षम हैं। करपात्र गौरव से पुरस्कृत प्रो .उपेंद्र पांडेय ने कहा कि स्वामी करपात्री अद्वैत वेदांती मनीषी संन्यासियों में मुकुटमणि के समान थे। धर्मसंघ के प्रधानमंत्री डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि करपात्र वाद अनुशासन और अनुराग का वाद है। संचालन पं. जगजीतन पांडेय, विषय स्थापना डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र, स्वागत प्रो. ब्रजभूषण ओझा, राजमंगल पांडेय ने किया। इस अवसर पर आचार्य विश्वनाथ गोपाल कृष्ण शास्त्री, पूर्व कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल, प्रो. चंद्रमौली उपाध्याय, प्रो. उपेंद्र पांडेय ने भी विचार रखे।
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