समय-समय पर लिखे गए आलेखों की यह एक मुकम्मल किताब है जो बहुत तैयारी और जिम्मेदारी के साथ लिखी है साथ ही इस पुस्तक में अपने पूर्ववर्ती आलोचकों से,उनकी स्थापनाओं से लेखक जिरह करता दिखाई देता है। यह बातें बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र की ओर से किताब की बात शृंखला कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता प्रो. संजीव कुमार दुबे ने कहीं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर प्रो. कृष्ण मोहन ने कहा कि लेखक ने पूरी संपूर्णता के साथ काम लिया है जिसे मील का पत्थर माना जाना चाहिए। प्रो. नीरज खरे ने कहा कि नामकरण की आलोचना में चल रहे विभिन्न संबोधन हमें पढ़ने की सहूलियत देते हैं। उनमें अनेक प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उन्मुक्त शब्द को उन सब संबोधनों के लिए प्रस्तावित किया जा सकता है। विशिष्ट वक्ता संजय श्रीवास्तव ने पुस्तक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कहानी की आलोचना में जिन बातों को आना चाहिए था। वो संवाद उस तल्खी के साथ नहीं आ पाया। आज उन्मुक्त कहानी का दौर है इसलिए इस पुस्तक पर आज की यह चर्चा ऐतिहासिक है। स्वागत कर भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह ने पुस्तक को कहानी की परंपरा और आधुनिका पर की गई टिप्पणियों की महत्वपूर्ण पुस्तक बताया। कार्यक्रम का संचालन सचिन कुमार गुप्ता ने तथा धन्यवाद शिखा सिंह ने किया।इस अवसर पर प्रो. आशीष त्रिपाठी, डॉ. रविशंकर सोनकर, डॉ. प्रभात मिश्र, डॉ. अशोक ज्योति डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. विवेक सिंह, डॉ प्रियंका सोनकर, शैलेंद्र सिंह तथा बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।