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श्रीचित्रकूट रामलीला समिति काशी के मंचन का चित्रकूट तालाब पर श्रीगणेश
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Sun, 03 Sep 2017 04:54 PM IST
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राक्षसों के अत्याचार से परेशान देवी-देवताओं ने की चित्रकूट में आराधना
- फोटो : अमर उजाला
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मोहक रूप-शृंगार, वस्त्र-विन्यास के अलावा मुखौटों, मुकुटों से राम-रावण की सेनाओं के पात्र सजने लगे हैं। काशी की प्राचीन लीलाओं के लिए सिंहासनों, स्वरूपों से लेकर लीला स्थलों तक को सजाने का काम अंतिम दौर में है।
अनंत चतुर्दशी यानी पांच सितंबर से काशी में रामलीलाओं के मंचन आरंभ होंगे। लेकिन शनिवार को देवताओं की आराधना से प्रसन्न होकर लक्ष्मी-नारायण का प्राकट्य, राजा बलि के यज्ञ और समुद्र मंथन से ऐतिहासिक चित्रकूट रामलीला समिति के मंचन का श्रीगणेश हो गया। इसी के साथ अब हर गली-मुहल्लों में रामलीलाओं के मंचन से महीने भर गुलजार रहेंगे।
देवी-देवताओं के यज्ञ विध्वंस होने लगे। राक्षसों के अत्याचार से देवलोक में चिंता व्याप्त हो गई। भयभीत देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु की आराधना शुरू कर दी, ताकि इस अत्याचार से उन्हें मुक्ति मिल सके। शनिवार की शाम चित्रकूट में हुई समुद्र मंथन की लीला का सार यही था।
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एक ओर जन्म के बाद राजा बलि ने अजर-अमर होने के लिए यज्ञ आरंभ कर दिया तो दूसरी ओर देवताओं ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए तपस्या शुरू की। चित्रकूट भवन में समुद्र मंथन की लीला के मंचन के लिए श्रीचित्रकूट रामलीला समिति काशी का रामायण मंडली के सदस्यों के अलावा भगवान के स्वरूप शाम पांच बजे पहुंचे।
वहां मंडप में राजा बलि का जन्म हुआ। जन्म होने के बाद बलि खुद को अजर-अमर होने का वरदान मांगने के लिए अपने गुरु शुक्राचार्य की मदद से यज्ञ करने लगा। शुक्राचार्य से जल लेकर उसने संकल्प किया। इसके बाद भगवान बामन ब्राह्मण वेश में प्रकट हुए।
उन्होंने बलि से तीन पग भूमि मांगी। शुक्राचार्य सलाह देते हैं कि ऐसा मत करो, नहीं तो दरिद्र हो जाओगे। लेकिन बलि तीन पग भूमि दे देता है। इसके बाद तीन पग आकाश, पाताल, धरती के रूप में भगवान लांग जाते हैं और बलि को पाताल में निवास करने के लिए कहते हैं।
उधर, देवताओं की प्रार्थना से भगवान लक्ष्मी-नारायण प्रगट होते हैं। वह आकाशवाणी करते हैं कि दशरथकुल में वह राम के रूप में जन्म लेकर राक्षसों का संहार करेंगे और राक्षसों के अत्याचार से मुक्ति दिलाएंगे।
इसके बाद चित्रकूट तालाब पर समुद्र मंथन की लीला होती है। भगवान लक्ष्मी नारायण की नयनाभिराम झांकी देखने के लिए लीला प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
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अनंत चतुर्दशी यानी पांच सितंबर से काशी में रामलीलाओं के मंचन आरंभ होंगे। लेकिन शनिवार को देवताओं की आराधना से प्रसन्न होकर लक्ष्मी-नारायण का प्राकट्य, राजा बलि के यज्ञ और समुद्र मंथन से ऐतिहासिक चित्रकूट रामलीला समिति के मंचन का श्रीगणेश हो गया। इसी के साथ अब हर गली-मुहल्लों में रामलीलाओं के मंचन से महीने भर गुलजार रहेंगे।
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देवी-देवताओं के यज्ञ विध्वंस होने लगे। राक्षसों के अत्याचार से देवलोक में चिंता व्याप्त हो गई। भयभीत देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु की आराधना शुरू कर दी, ताकि इस अत्याचार से उन्हें मुक्ति मिल सके। शनिवार की शाम चित्रकूट में हुई समुद्र मंथन की लीला का सार यही था।
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एक ओर जन्म के बाद राजा बलि ने अजर-अमर होने के लिए यज्ञ आरंभ कर दिया तो दूसरी ओर देवताओं ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए तपस्या शुरू की। चित्रकूट भवन में समुद्र मंथन की लीला के मंचन के लिए श्रीचित्रकूट रामलीला समिति काशी का रामायण मंडली के सदस्यों के अलावा भगवान के स्वरूप शाम पांच बजे पहुंचे।
वहां मंडप में राजा बलि का जन्म हुआ। जन्म होने के बाद बलि खुद को अजर-अमर होने का वरदान मांगने के लिए अपने गुरु शुक्राचार्य की मदद से यज्ञ करने लगा। शुक्राचार्य से जल लेकर उसने संकल्प किया। इसके बाद भगवान बामन ब्राह्मण वेश में प्रकट हुए।
उन्होंने बलि से तीन पग भूमि मांगी। शुक्राचार्य सलाह देते हैं कि ऐसा मत करो, नहीं तो दरिद्र हो जाओगे। लेकिन बलि तीन पग भूमि दे देता है। इसके बाद तीन पग आकाश, पाताल, धरती के रूप में भगवान लांग जाते हैं और बलि को पाताल में निवास करने के लिए कहते हैं।
उधर, देवताओं की प्रार्थना से भगवान लक्ष्मी-नारायण प्रगट होते हैं। वह आकाशवाणी करते हैं कि दशरथकुल में वह राम के रूप में जन्म लेकर राक्षसों का संहार करेंगे और राक्षसों के अत्याचार से मुक्ति दिलाएंगे।
इसके बाद चित्रकूट तालाब पर समुद्र मंथन की लीला होती है। भगवान लक्ष्मी नारायण की नयनाभिराम झांकी देखने के लिए लीला प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
मृदंग-झांझ पर रामायण मंडली ने किया सस्वर पाठ
मुखौटों, मुकुटों से राम-रावण की सेनाओं के पात्र सजने लगे हैं।
- फोटो : अमर उजाला
मृदंग, झांझ पर रामायण मंडली ने परंपरागत शैली में चित्रकूट भवन परिसर में सस्वर पाठ किया तो लोग भक्तिभाव में झूमने लगे। लीला के व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय ने पाठ के बाद आरती कराई।