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श्रावणी फुहार :‘पिया मेहंदी लिया दा मोतीझील से, जाइके साइकिल से...’
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 01 Aug 2018 05:50 PM IST
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बिदिशा हाजरा
- फोटो : अमर उजाला
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बरखा ऋतु जीवन में खुशहाली लेकर आती है। सावन की घटाएं हर किसी के लिए खास होती है। बादलों का उमड़ना और घुमड़ना मन को खुश कर जाता है। ऐसे में प्रकृति के रोम रोम से संगीत फूट पड़ता है। बादलों के गरजने में, बारिश की बूंदों में एक अलग ही साज और सरगम सुनने को मिलता है। और संगीत के तार जब मन को छूते हैं तो हर कोई प्रेम रस में डूब जाता है। चाहे वो मानव मन हो या या फिर पशु पक्षी। कोयल की कूक और मोर का नृत्य के साथ पेड़ों पर पड़े झूले सावन की अलग ही आभा प्रकृति में बिखेर देते हैं। ये कहना है कि बीएचयू की संगीत शोध छात्रा बिदिशा हाजरा का...।
सावन में पेड़ों पर पड़े झूले, हाथों में भरी हरी चूडि़यां और मेहंदी से रचे हाथ स्त्री की पहचान बन जाते हैं। हर ओर संगीत का एक अलग ही रंग देखने को मिलता है। राग मल्हार की बंदिशों के साथ कजरी के बोल भी सुनाई देने लगते हैं। इन कजरियों में शृंगार का रस प्रमुख रूप से होता है। यही वजह है कि हर स्त्री को बड़ी बेसब्री से सावन का इंतजार रहता है। बिदिशा हाजरा बनारस की प्रमुख कजरी सुनाती हैं, ‘पिया मेहंदी लिया दा मोतीझील से, जाइके साइकिल से...’।
बनारस की पारंपरिक संगीत गायिका बिदिशा हाजरा कहती हैं कि बरखा ऋतु में मल्हार राग सबसे प्रमुख है। ये राग बारिश का राग है। सारंग के भी काफी बंदिशों में बारिश का वर्णन मिलता है। यहां की पांपरिक कजरी ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ में यहां की मस्ती भरी जिंदगी की छवि मिलती है। कहती हैं कि कजरी लोकगीतों की रानी मानी जाती हैं। बनारस और मिर्जापुर की कजरी बहुत ही मशहूर है जो कि सावन में खूब गाई और सुनी जाती है। कजरी में उत्साह और उत्सव के रंग तो मिलते ही हैं, विरह की वेदना भी मिलती है।
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बिदिशा कहती हैं कि रविंद्र संगीत में भी बारिश का वर्णन खूब है। रविंद्र संगीत की बंदिश सुनाती हैं, ‘पगला हाओवार बादोल, दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...’। यानी कि सावन में बादल पागल हो गया है और बादल की तरह मेरा मन भी पागल हो रहा है। दूसरी बंदिश सुनाती हैं, ‘आज सराबोनेर लोघू मेघेर साथे मोन चोले मोर भेशे...’। इसका मतलब है कि काले काले बादल जिस तरह चल रहे हैं, मेरा मन भी उन्हीं बादलों के साथ बह रहा है।
बनारस परंपरा में पारंपरिक संगीत की शिक्षा
चार साल की छोटी सी उम्र से संगीत का लगाव हो गया। इसी उम्र से बिदिशा ने स्मरजित चटर्जी से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। 12वीं बोर्ड में संगीत में सर्वोच्च अंक लाने के बाद उन्होंने बीएचयू से बीम्यूज, एमम्यूज, एमफिल किया और अब पीएचडी कर रही हैं। बनारस परंपरा में पारंपरिक संगीत की शिक्षा पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्र से ली है। प्रो. शारदा वेलंकर, प्रो. संगीता पंडित से संगीत की शिक्षा जारी है। 2010 में यंग आर्टिस्ट स्कालरशिप से नवाजी गई। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिल चुका है।
सावन में पेड़ों पर पड़े झूले, हाथों में भरी हरी चूडि़यां और मेहंदी से रचे हाथ स्त्री की पहचान बन जाते हैं। हर ओर संगीत का एक अलग ही रंग देखने को मिलता है। राग मल्हार की बंदिशों के साथ कजरी के बोल भी सुनाई देने लगते हैं। इन कजरियों में शृंगार का रस प्रमुख रूप से होता है। यही वजह है कि हर स्त्री को बड़ी बेसब्री से सावन का इंतजार रहता है। बिदिशा हाजरा बनारस की प्रमुख कजरी सुनाती हैं, ‘पिया मेहंदी लिया दा मोतीझील से, जाइके साइकिल से...’।
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बनारस की पारंपरिक संगीत गायिका बिदिशा हाजरा कहती हैं कि बरखा ऋतु में मल्हार राग सबसे प्रमुख है। ये राग बारिश का राग है। सारंग के भी काफी बंदिशों में बारिश का वर्णन मिलता है। यहां की पांपरिक कजरी ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ में यहां की मस्ती भरी जिंदगी की छवि मिलती है। कहती हैं कि कजरी लोकगीतों की रानी मानी जाती हैं। बनारस और मिर्जापुर की कजरी बहुत ही मशहूर है जो कि सावन में खूब गाई और सुनी जाती है। कजरी में उत्साह और उत्सव के रंग तो मिलते ही हैं, विरह की वेदना भी मिलती है।
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बिदिशा कहती हैं कि रविंद्र संगीत में भी बारिश का वर्णन खूब है। रविंद्र संगीत की बंदिश सुनाती हैं, ‘पगला हाओवार बादोल, दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...’। यानी कि सावन में बादल पागल हो गया है और बादल की तरह मेरा मन भी पागल हो रहा है। दूसरी बंदिश सुनाती हैं, ‘आज सराबोनेर लोघू मेघेर साथे मोन चोले मोर भेशे...’। इसका मतलब है कि काले काले बादल जिस तरह चल रहे हैं, मेरा मन भी उन्हीं बादलों के साथ बह रहा है।
बनारस परंपरा में पारंपरिक संगीत की शिक्षा
चार साल की छोटी सी उम्र से संगीत का लगाव हो गया। इसी उम्र से बिदिशा ने स्मरजित चटर्जी से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। 12वीं बोर्ड में संगीत में सर्वोच्च अंक लाने के बाद उन्होंने बीएचयू से बीम्यूज, एमम्यूज, एमफिल किया और अब पीएचडी कर रही हैं। बनारस परंपरा में पारंपरिक संगीत की शिक्षा पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्र से ली है। प्रो. शारदा वेलंकर, प्रो. संगीता पंडित से संगीत की शिक्षा जारी है। 2010 में यंग आर्टिस्ट स्कालरशिप से नवाजी गई। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिल चुका है।