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शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कथक में पिरोया काशी का सौंदर्य
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 12 May 2016 02:25 AM IST
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बीएचयू में कथक पेश करतीं शर्मिष्ठा मुखर्जी।
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काशी की कला, घाटों के सौंदर्य के साथ कथक नृत्यांगना शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपनी भावभंगिमाओं में यहां के दर्शन और मोक्ष के रहस्य को मंच पर उतारा। बुधवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पंडित ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में शिव की नगरी पर आधारित उनके कथक नृत्य में बनारस साक्षात उपस्थिति हो गया था। गोदौलिया चौराहे के कोलाहल का दृश्य उनका खुद का अनुभव था तो काशी के कला-सौंदर्य को सहेजने के साथ बनारस की अजमत और उसकी खासियतों की सलामती की अरज भी उनके नृत्य में पिरोई रही।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आगमन की पूर्व संध्या पर उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी और उनकी टीम ने प्राचीन शहर काशी जिसे ‘आनंद कानन’ के नाम से भी जानते हैं, उसे कथक नृत्य में पिरोया। शुरुआत उनकी टीम ने अपने कदमों और भाव भंगिमाओं के जरिये भगवान शिव की स्तुति के साथ की। इसके बाद तो काशी की जिंदादिली और घाटों का सौंदर्य कथक के जरिये मंच पर मानों खड़ा हो गया। इसके बाद बनारसी ठुमरी ‘आ जा सावरिया तोहे गलवा लगायो’ पर शर्मिष्ठा ने कला और संस्कृति के शहर बनारस का बखान किया।
काशी की बात बिना मणिकर्णिका के पूरी नहीं हो सकती, जहां मृत्यु के साथ नए आरंभ का संदेश हो। जलती चिताओं के बीच गूंजते मोक्ष के रहस्य को उन्होंने बेहद खूबसूरती से अपनी भावभंगिमाओं के जरिये प्रस्तुत किया। शाम सवा छह से साढ़े सात बजे तक सवा घंटे तक चले कथक नृत्य की अंतिम कड़ी काशी की गंगा जमुनी तहजीब पर थी। मंदिर के घंटों और अजान की सदाओं के बीच बनारस की इस अजमत को सलामत रखने की खुदा से दरख्वास्त की यह प्रस्तुति हर किसी के जेहन में यादगार बनकर उतरी।
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शर्मिष्ठा मुखर्जी के साथ उनकी टीम में विद्या गौरी, समीक्षा शर्मा, तृप्ति, लक्ष्मी, शिवानी और दीप्ति गुप्ता रहीं। इस अवसर पर कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी, प्रो. चित्तरंजन ज्योतिषी, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी, प्रो. पीसी उपाध्याय, डॉ. विश्वनाथ पांडेय आदि मौजूद रहे। इस अवसर पर महिला अध्ययन केंद्र बीएचयू की समन्वयक प्रो. रीता सिंह की पुस्तक ‘परिवर्तन : एक परिदृश्य’ का लोकार्पण भी कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी और शर्मिष्ठा मुखर्जी ने किया।
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आगमन की पूर्व संध्या पर उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी और उनकी टीम ने प्राचीन शहर काशी जिसे ‘आनंद कानन’ के नाम से भी जानते हैं, उसे कथक नृत्य में पिरोया। शुरुआत उनकी टीम ने अपने कदमों और भाव भंगिमाओं के जरिये भगवान शिव की स्तुति के साथ की। इसके बाद तो काशी की जिंदादिली और घाटों का सौंदर्य कथक के जरिये मंच पर मानों खड़ा हो गया। इसके बाद बनारसी ठुमरी ‘आ जा सावरिया तोहे गलवा लगायो’ पर शर्मिष्ठा ने कला और संस्कृति के शहर बनारस का बखान किया।
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काशी की बात बिना मणिकर्णिका के पूरी नहीं हो सकती, जहां मृत्यु के साथ नए आरंभ का संदेश हो। जलती चिताओं के बीच गूंजते मोक्ष के रहस्य को उन्होंने बेहद खूबसूरती से अपनी भावभंगिमाओं के जरिये प्रस्तुत किया। शाम सवा छह से साढ़े सात बजे तक सवा घंटे तक चले कथक नृत्य की अंतिम कड़ी काशी की गंगा जमुनी तहजीब पर थी। मंदिर के घंटों और अजान की सदाओं के बीच बनारस की इस अजमत को सलामत रखने की खुदा से दरख्वास्त की यह प्रस्तुति हर किसी के जेहन में यादगार बनकर उतरी।
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शर्मिष्ठा मुखर्जी के साथ उनकी टीम में विद्या गौरी, समीक्षा शर्मा, तृप्ति, लक्ष्मी, शिवानी और दीप्ति गुप्ता रहीं। इस अवसर पर कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी, प्रो. चित्तरंजन ज्योतिषी, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी, प्रो. पीसी उपाध्याय, डॉ. विश्वनाथ पांडेय आदि मौजूद रहे। इस अवसर पर महिला अध्ययन केंद्र बीएचयू की समन्वयक प्रो. रीता सिंह की पुस्तक ‘परिवर्तन : एक परिदृश्य’ का लोकार्पण भी कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी और शर्मिष्ठा मुखर्जी ने किया।