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शहीद दिवस: भगत सिंह और राजगुरु का था बनारस से गहरा नाता

Tue, 23 Mar 2021 05:26 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Tue, 23 Mar 2021 05:26 PM IST
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shahid diwas: Bhagat Singh and Rajguru had bond with Banaras
राजगुरू, भगत सिंह। - फोटो : अमर उजाला

बनारस आरंभ से ही क्रांति और क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है। बनारस के घाट, कुंड और गलियां क्रांतिकारियों का गुप्त ठिकाना हुआ करती थीं। चंद्रशेखर आजाद से लेकर भगत सिंह अक्सर बनारस आया करते थे। बालाजी घाट, रामकुंड, काशी विद्यापीठ और बेनिया अखाड़े के आसपास क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकें होती थीं।

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देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। भगत सिंह और राजगुरूका बनारस से भी गहरा नाता था। प्रो. रवि प्रकाश पांडेय ने बताया कि भगत सिंह और राजगुरु की पहली मुलाकात भी बनारस में ही हुई थी।  हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने जयदेव कपूर को संगठन को मजबूत करने के लिए बनारस भेजा था। इसी समय भगत सिंह भी बनारस पहुंचे और जय देव के साथ कुछ दिनों के लिए लिम्बडी हास्टल में ठहरे थे।
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वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि पहली बार बनारस में भगत सिंह की मदद शचींद्र नाथ सान्याल ने की थी। विवाह प्रस्ताव के बारे में भी शचींद्र नाथ शान्याल के मार्गदर्शन के बाद भगत सिंह की दुविधा दूर हुई थी। शचींद्र नाथ सान्याल ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की थी। महात्मा गांधी द्वारा 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद देश के युवाओं को इस संगठन ने राह दिखाई थी। 1924 में भगत सिंह ने भी इसकी सदस्यता ग्रहण की थी। इसी के माध्यम से उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल से हुई थी।

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महामना ने दायर की थी दया याचिका
महामना मदन मोहन मालवीय को जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फ ांसी की सजा का पता चला तो बेचैन हो गए। इसके बाद 14 फ रवरी 1931 को वह खुद लॉर्ड इरविन के पास दया याचिका लेकर गए। इसमें उन तीनों की फांसी पर रोक लगाने और उनकी सजा को कम करने का आग्रह किया गया था।

रेकी करने गए थे गोरखपुर
बनारस बार के पूर्व महामंत्री वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानन्द राय और क्रांतिकारियों पर स्वतंत्र रूप से शोध कर रहे नित्यानन्द राय ने बताया कि राजगुरु जन्म से मराठा थे लेकिन कर्मभूमि बनाया बनारस को। भगत सिंह से बहुत पटती थी, बोलते बहुत कम थे एक ही कमजोरी थी सोने की। एक बार की बात है चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह, राजगुरु, शिव वर्मा को सरकारी खजाने की टोह लेने के लिए गोरखपुर भेजा।

राजगुरु हो गए गायब
तीन दिन तक रेकी कर तीनों बनारस लौटने के लिए गोरखपुर स्टेशन पहुंचे। बनारस वाली ट्रेन में देरी थी तो भगत सिंह ने सोचा काम पूरा हो गया है सो लगे हाथ एक मित्र हलधर से क्यों ना मिल लें। शिव वर्मा तो तैयार हो गए, राजगुरु ने इनकार कर दिया। कहा, प्लेटफ ार्म पर पुल के नीचे समय पर मिल जाऊंगा, वहीं आकर ढूंढ लेना। राजगुरु को स्टेशन के बाहर छोङ़कर दोनों चल दिए। ट्रेन कीरवानगी के समय लौटे तो राजगुरुगायब थे। हर जगह ढूंढा, लेकिन नहीं मिले। ट्रेन ने सीटी मारी तो दोनों ट्रेन में सवार हो गए। यह सोचकर कि कहीं ट्रेन में ही बैठा होगा बनारस मिल जाएगा। जब बनारस में भी राजगुरु का पता नहीं चला तो भगत सिंह व शिव वर्मा चिंतित हुए। 

दूसरे दिन पहुंचे थे राजगुरु
दूसरे दिन राजगुरु को बनारस स्टेशन पर ट्रेन से उतरता देख भगत सिंह व शिव वर्मा की खुशी का ठिकाना न रहा। राजगुरु ने गुस्से में कहा कि मुझे अकेला छोङ़कर चले आए। यह भी न सोचा कि लौटने के लिए मेरे पास पैसे हैं या नहीं। दूसरे दिन राजगुरु का गुस्सा शांत हुआ। बताया कि गाङ़ी आने में देर थी। मुझे नींद आने लगी। स्टेशन के बाहर तमाम इमली के पेङ़ हैं। मैंने कंबल बिछाया और पेड़ के नीचे सो गया। मुझे सोता छोङ़कर चले कैसे आए। जगाया क्यों नही। राजगुरु भगत सिंह से अक्सर कहते थे, तेरा साथ अंत समय तक नहीं छोङ़ने वाला और अपने वचन की रक्षा भी की और वतन के लिए भगत सिंह के साथ हंसते हंसते फांसी के फं दे को चूम लिया।

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