Sawan Special: काशी का दक्षिण द्वार है शूलटंकेश्वर मंदिर, भगवान शिव ने यहीं त्रिशूल से रोका था गंगा का प्रवाह
शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर को काशी का दक्षिणी द्वार कहा जाता है। दर्शन-पूजन के लिए यहां आम दिनों में तो श्रद्धालु आते ही हैं, शिवरात्रि और सावन में काफी भीड़ होती है। पौराणिक महत्व के इस मंदिर का शिव पुराण में भी उल्लेख है।
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मंदिरों के शहर काशी में महादेव का एक मंदिर ऐसा भी है जो भक्तों के समस्त शूल हर लेता है। नाम है शूलटंकेश्वर महादेव। काशी में गंगा का प्रवेश द्वार शूलटंकेश्वर कैंट स्टेशन से 15 किलोमीटर और अखरी बाईपास से चार किलोमीटर की दूरी पर ये मंदिर है। दर्शन-पूजन के लिए यहां आम दिनों में तो श्रद्धालु आते ही हैं, शिवरात्रि और सावन में काफी भीड़ होती है। गंगा का किनारा और खुला-खुला मंदिर लोगों को आकर्षित करता है।
काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि काशी खंड के अनुसार इस मंदिर का नाम पहले माधव ऋषि के नाम पर माधवेश्वर महादेव था। शिव की आराधना के लिए उन्होंने ही इस लिंग की स्थापना की थी। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम भी माधवपुर है।
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शूलटंकेश्वर में ही गंगा होती हैं उत्तरवाहिनी
गंगा तट पर तपस्या करने वाले ऋषियों-मुनियों ने इस शिवलिंग का नाम शूलटंकेश्वर रखा। इसके पीछे धारणा यह थी कि जिस प्रकार यहां गंगा का कष्ट दूर हुआ उसी प्रकार अन्य भक्तों का कष्ट दूर हो। यही वजह है कि पूरे वर्ष तो यहां भक्त दर्शन को आते ही हैं लेकिन अपने कष्टों से मुक्ति के लिए सावन में भक्तों की भीड़ ज्यादा होती है।
मां गंगा को रोकने के लिए भगवान शिव ने गाड़ दिया था त्रिशूल
आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि गंगा अवतरण के बाद भगवान शिव ने जब उनको जटा से मुक्त किया तो वह क्रोधित होकर शिव के धाम से निकलीं। जब वह काशी में प्रवेश करने वाली थीं तो उनके मन में यह विचार आया कि हम भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी काशी के बीचों बीच होकर बहेंगे और काशी को नष्ट कर देंगे। भगवान शिव को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने मां गंगा को काशी के दक्षिण में ही त्रिशूल फेंककर रोक दिया। इससे मां गंगा को पीड़ा होने लगी। उन्होंने क्षमा याचना की।
भगवान शिव ने यह वचन लिया कि वह काशी को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होंगी। साथ ही काशी में गंगा स्नान करने वाले भक्त को कोई जलीय जीव हानि नहीं पहुंचाएगा। गंगा ने जब दोनों वचन स्वीकार किए तब शिव ने अपना त्रिशूल वापस लिया।