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डिजिटल फाॅर्म में सहेजा जा रहा दुर्लभ बौद्ध-तिब्बती साहित्य
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 29 Jun 2016 01:41 AM IST
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प्राचीन बौद्ध ग्रंथों को अब अगले कई दशकों तक पढ़ा-देखा और सुना जा सकेगा। केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय ने बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए बेहद पवित्र और दुर्लभ बौद्ध ग्रंथों, तिब्बती साहित्य समेत हिमालयी पारंपरिक पुस्तकों को सहेज रही है। तकनीकी की मदद से इन पांडुलिपियों और पुस्तकों का डिजिटलाइजेशन कर उन्हें वीडियो और ऑडियो फार्मेट में सुरक्षित रखा जा रहा है।
करीब छह दशक पहले जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया था, तिब्बती नए ठौर की तलाश में भारत आए तो वे बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथ और साहित्य भी ले आए थे। इसमें कई पांडुलिपियां तो सदियों पुरानी हैं, जिसमें बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और ज्ञान का अतुलनीय संग्रह है। कालांतर में तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद ऐसे कई दुर्लभ ग्रंथ यहां के शांत रक्षित नामक ग्रंथालय लाए गए। ग्रंथालय में ये सभी पांडुलिपियां सुरक्षित हैं।
इन पांडुलिपियों और बौद्ध व संस्कृत में अनुवादित साहित्य को सहेजने के लिए ग्रंथालय के मल्टीमीडिया विभाग द्वारा पहले उन्हें ऑडियो, वीडियो कैसेट, सीडी, एमपी थ्री, एमपी 4 और डीवीडी फार्म में सुरक्षित किया गया। अब इन सभी को स्कैन कर उन्हें डिजिटल फार्म में सुरक्षित किया गया। बाद में इन्हेें माइक्रोफिल्म और माइक्रोफिश के रूप में संरक्षित किया गया है।
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प्राचीन संस्कृत पांडुलिपियों के तिब्बती अनुवाद के रूप में भारतीय बौद्ध वांग्मय का समृद्ध अपने मौलिक रूप में काष्ठोत्कीर्णत (जाइलोग्राफ) मल्टी मीडिया रूप में विद्यमान है। ग्रंथालय में 20,000 जाइलोग्राफ हैं। इनके अलावा ग्रंथालय में एक लाख 11 हजार से अधिक बौद्ध और संस्कृत से जुड़े ग्रंथ हैं।
गोंधाला में मिले त्रिपटक के 40 दुर्लभ अंक
महाराष्ट्र के गोंधाला गांव में त्रिपटक के 40 दुर्लभ अंक मिले हैं। इन्हें गांव के रमेश ठाकुर के पास सुरक्षित रखा गया है। पिछले दिनों केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय की टीम ने वहां जाकर उसका पूरा डिजिटल फार्म तैयार किया है। उसकी फोटोग्राफी से लेकर उसकी स्कैनिंग कर उसे अब डिजिटल फार्म में तैयार कर लिया है। मल्टी मीडिया विभाग के इंचार्ज नवांग छेपक ने बताया कि त्रिपटक बुद्ध धर्म का मुख्य ग्रंथ है।
गौतम बुद्ध द्वारा उपदेशों को इसमें सूत्रबद्ध किया गया है। यह पाली भाषा में है। इसके 105 वॉल्यूम में है। गोंधाला गांव में हमें 40 अंक ही मिले। बाकी अंक लद्दाख में किसी व्यक्ति के पास हैं। जल्द ही हमारी टीम वहां जाकर संबंधित व्यक्ति की तलाश करेगी।
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करीब छह दशक पहले जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया था, तिब्बती नए ठौर की तलाश में भारत आए तो वे बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथ और साहित्य भी ले आए थे। इसमें कई पांडुलिपियां तो सदियों पुरानी हैं, जिसमें बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और ज्ञान का अतुलनीय संग्रह है। कालांतर में तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद ऐसे कई दुर्लभ ग्रंथ यहां के शांत रक्षित नामक ग्रंथालय लाए गए। ग्रंथालय में ये सभी पांडुलिपियां सुरक्षित हैं।
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इन पांडुलिपियों और बौद्ध व संस्कृत में अनुवादित साहित्य को सहेजने के लिए ग्रंथालय के मल्टीमीडिया विभाग द्वारा पहले उन्हें ऑडियो, वीडियो कैसेट, सीडी, एमपी थ्री, एमपी 4 और डीवीडी फार्म में सुरक्षित किया गया। अब इन सभी को स्कैन कर उन्हें डिजिटल फार्म में सुरक्षित किया गया। बाद में इन्हेें माइक्रोफिल्म और माइक्रोफिश के रूप में संरक्षित किया गया है।
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प्राचीन संस्कृत पांडुलिपियों के तिब्बती अनुवाद के रूप में भारतीय बौद्ध वांग्मय का समृद्ध अपने मौलिक रूप में काष्ठोत्कीर्णत (जाइलोग्राफ) मल्टी मीडिया रूप में विद्यमान है। ग्रंथालय में 20,000 जाइलोग्राफ हैं। इनके अलावा ग्रंथालय में एक लाख 11 हजार से अधिक बौद्ध और संस्कृत से जुड़े ग्रंथ हैं।
गोंधाला में मिले त्रिपटक के 40 दुर्लभ अंक
महाराष्ट्र के गोंधाला गांव में त्रिपटक के 40 दुर्लभ अंक मिले हैं। इन्हें गांव के रमेश ठाकुर के पास सुरक्षित रखा गया है। पिछले दिनों केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय की टीम ने वहां जाकर उसका पूरा डिजिटल फार्म तैयार किया है। उसकी फोटोग्राफी से लेकर उसकी स्कैनिंग कर उसे अब डिजिटल फार्म में तैयार कर लिया है। मल्टी मीडिया विभाग के इंचार्ज नवांग छेपक ने बताया कि त्रिपटक बुद्ध धर्म का मुख्य ग्रंथ है।
गौतम बुद्ध द्वारा उपदेशों को इसमें सूत्रबद्ध किया गया है। यह पाली भाषा में है। इसके 105 वॉल्यूम में है। गोंधाला गांव में हमें 40 अंक ही मिले। बाकी अंक लद्दाख में किसी व्यक्ति के पास हैं। जल्द ही हमारी टीम वहां जाकर संबंधित व्यक्ति की तलाश करेगी।