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Sarnath: सिल्क का कपड़ा लपेटने की परंपरा के सवाल पर बना यूनेस्को हेरिटेज, जानें क्या है देवदुष्य; BHU का जवाब

Mon, 27 Jul 2026 02:11 PM IST
Aman Vishwakarma हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Mon, 27 Jul 2026 02:11 PM IST
सार

Varanasi News: यूनेस्को ने सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की प्रक्रिया के दौरान पूछा कि निर्माणकाल से अब तक कौन-सी परंपरा जीवित है। बीएचयू के शोधकर्ताओं ने स्तूपों पर उकेरी गई कलाकृतियों के आधार पर देवदुष्य (सिल्क वस्त्र लपेटने) की परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत किया। इसी शोध ने सारनाथ की दावेदारी को मजबूत आधार प्रदान किया।

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Sarnath UNESCO Heritage status linked tradition of draping silk cloth Devadushya BHU provides answer
सारनाथ का धमेख स्तूप। - फोटो : संवाद

विस्तार

Sarnath Varanasi: सारनाथ को भारत के 45वें यूनेस्को स्मारक का दर्जा दिलाने में पिछले साल अक्तूबर का दौरा सबसे खास रहा। जब जांच टीम ने सारनाथ के बौद्ध उपदेश स्थल का निरीक्षण किया तो धमेख स्तूप को देखकर कई सवाल पूछे। इसका जवाब सारनाथ विशेषज्ञों और प्रशासन की ओर से दिया गया। लेकिन, अंतिम सवाल ने थोड़ा उलझा दिया। 

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वह यह था कि स्तूप से जुड़ी ऐसी कौन सी परंपरा है जो इसके बनने के दौरान भी थी और आज भी चल रही है। बीएचयू से संपर्क किया गया तो पता चला कि धमेख स्तूप के पत्थर पर बनी फूलों जैसी नक्काशी में ही इस सवाल का जवाब छिपा है। ये कलाकृतियां काशी की ही विशिष्ट शैली में सिल्क कपड़ों पर बुनी गई डिजाइन की प्रतीक हैं जो करीब 2300 साल पहले की देवदुष्य परंपरा से जुड़ी हैं। 

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मौर्य सम्राट अशोक के काल में जब स्तूप का निर्माण हुआ था तब अनुष्ठान के दौरान बौद्ध अनुयायी स्तूप पर सिल्क के कपड़े लपेटते थे और ये परंपरा आज भी चल रही है। प्राचीन काल में लपेटे कपड़े कुछ समय में खराब हो जाते थे तो इसे स्तूप के पत्थर पर डिजाइन उकेर कर देवदुष्य परंपरा को स्थायी पहचान दे दी गई। बीएचयू के कला-इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रो. ज्योति रोहिल्ला राणा की ओर से ये जवाब दिया गया था।

प्रो. ज्योति राणा ने बताया कि धमेख स्तूप के निचले भाग पर सुंदर फूल, बेल-बूटों और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी है। तब काशी में खास शैली के कपड़ों के लिए ये नक्काशी की जाती थी। महापरिनिब्बान सूत्र किताब के अनुसार, गौतम बुद्ध के महानिर्वाण के बाद जो अनुष्ठान हुए उसमें देश भर से कई वस्तुएं कुशीनगर भेजी गई थीं। काशी से ये कपड़े भेज गए थे। उसी में लपेट कर गौतम बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। काशी कपड़ों का बहुत पुराना केंद्र है। डिजाइन व्यक्त करने की कला यहां विकसित हुई।

स्तूप की नक्काशी बुने हुए कढ़ाईदार कपड़े के रूप में : देवदुष्य संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है दैवीय या अत्यंत उत्कृष्ट वस्त्र। प्राचीन भारतीय साहित्य खासकर जैन और संस्कृत ग्रंथों में इसे बहुमूल्य, महीन और अलंकृत कपड़े के रूप में बताया गया है। कुछ विद्वान इसे रेशमी भी कहते हैं। 

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बीआर मणि ने अपनी किताब में किया है इसका उल्लेख 
काशी के पुरातत्वविद डॉ. बीआर मणि ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से सारनाथ पर किताब प्रकाशित की। इसमें बताया गया है कि स्तूप पर आधार के मध्य भाग में आठ आले बने हुए हैं, जिनमें कभी मूर्तियां स्थापित थीं। इन आलों के ठीक नीचे एक चौड़ी अलंकृत पट्टी है, जिस पर ज्यामितीय आकृतियां, पुष्पीय बेल-बूटे, पक्षियों और मानव आकृतियों की उत्कृष्ट नक्काशी की गई है। ये नक्काशी उस मूल वस्त्र-आवरण (देवदुष्य) के डिजाइन की तरह प्रतीत होती हैं, जिसे कभी स्तूप पर लपेटा जाता था। 

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भारत की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान

यूनेस्को का  प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने का फैसला भारत की समृद्ध सभ्यता को सम्मान देने वाला है। यह फैसला बताता है कि भारतीय सभ्यता हमेशा से ही  ज्ञान, करुणा और सद्भाव के शाश्वत संदेश से मानवता को प्रेरित करती रही है। - एस जयशंकर, विदेश मंत्री की सोशल मीडिया पोस्ट

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