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काशी की धरोहरों को बचाने के लिए साधु-संतों ने किया शंखनाद, निकाला पैदल मार्च
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 07 May 2018 10:04 PM IST
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शंखनाद करते साधु-संत
- फोटो : अमर उजाला
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असि संगम ने शंख, डमरू और हर-हर महादेव के जयघोष के साथ मंदिरों को बचाने के लिए जनांदोलन का शुभारंभ हुआ। विकास के नाम पर काशी की धरोहरों, सैकड़ों साल पुराने मंदिरों और देव विग्रहों को जमींदोज करने के विरुद्ध संतों व आम नागरिकों ने पैदल मार्च निकाला। अस्सी घाट से निकलकर यह पैदल यात्रा वरुणा के संगम पर समाप्त हुई। इसमें विरोध मार्च में साधु-संत, बटुक, महंत व आम नागरिकों ने हिस्सा लिया।
सोमवार को असि संगम पर मंदिर बचाओ आंदोलनम् की शुरुआत करते हुए ज्योतिष एवं शारदापीठाधीश्वर, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य व श्री विद्यामठ के प्रभारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि काशी में आस्था पर कुठाराघात किया जा रहा है।
काशी के उन पौराणिक मंदिरों जिनकी वर्षों से पूजा-अर्चना होती चली आ रही है, सौ करोड़ सनातनधर्मियों की आस्था के केंद्र हैं उन्हें विकास के नाम पर तोड़कर मलबा बनाकर फेंकने की कोशिश की जा रही है।
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पीएम मोदी ने काशी में वह काम किया है जो कभी आक्रांताओं ने करने की कोशिश की थी। लेकिन काशी के नागरिक और साधु-संत ऐसा नहीं होने देंगे। अब मंगलवार से रोजाना आठ दिनों तक अलग-अलग घाटों पर विविध समुदाय के लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन होगा। फिर 16 मई से काशी यात्रा शुरू होगी जिसका समापन 29 मई को होगा।
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सोमवार को असि संगम पर मंदिर बचाओ आंदोलनम् की शुरुआत करते हुए ज्योतिष एवं शारदापीठाधीश्वर, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य व श्री विद्यामठ के प्रभारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि काशी में आस्था पर कुठाराघात किया जा रहा है।
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काशी के उन पौराणिक मंदिरों जिनकी वर्षों से पूजा-अर्चना होती चली आ रही है, सौ करोड़ सनातनधर्मियों की आस्था के केंद्र हैं उन्हें विकास के नाम पर तोड़कर मलबा बनाकर फेंकने की कोशिश की जा रही है।
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पीएम मोदी ने काशी में वह काम किया है जो कभी आक्रांताओं ने करने की कोशिश की थी। लेकिन काशी के नागरिक और साधु-संत ऐसा नहीं होने देंगे। अब मंगलवार से रोजाना आठ दिनों तक अलग-अलग घाटों पर विविध समुदाय के लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन होगा। फिर 16 मई से काशी यात्रा शुरू होगी जिसका समापन 29 मई को होगा।
अवैध कब्जे की जद में है भारत नेपाल की मैत्री का प्रतीक
पशुपति नाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
भारत नेपाल की मैत्री का प्रतीक नेपाली मंदिर भी अवैध कब्जे की जद में है। काशी नरेश से खरीदी गई आठ बिस्वा जमीन वर्तमान में अवैध कब्जे के कारण सिमटकर ढाई बिस्वा ही बची है।
नगर निगम के दस्तावेजों में हेरफेर और फर्जी दस्तावेज लगाकर अवैध कब्जेदारों ने पशुपति नाथ मंदिर के एक हिस्से को पिछले कई सालों से कब्जे में ले रखा है। सीएम योगी आदित्यनाथ के दिशा-निर्देश के बाद भी स्थानीय प्रशासन अवैध कब्जे को नहीं हटवा सका है।
साम्राज्येश्वर पशुपति महादेव मंदिर और धर्मशाला कमेटी के गोपाल प्रसाद अधिकारी ने बताया कि नगर निगम ने पशुपति नाथ मंदिर के पूर्व नेपाली पुजारी परशुराम वैद्य का फर्जी मृत्युप्रमाणपत्र जारी कर दिया है।
परशुराम वैद्य की मौत 1947 में नेपाल में हुई थी लेकिन नगर निगम से जारी मृत्यु प्रमाणपत्र में उनकी मौत 2002 में दिखाई गई है। अवैध कब्जेदार ने इसी फर्जी प्रमाणपत्र का सहारा लेते हुए स्वयं को मंदिर के उस हिस्से का कब्जेदार दिखाया है।
नेपाल नरेश ने काशी नरेश से आठ बिस्वा जमीन मंदिर निर्माण के लिए खरीदी थी जो वर्तमान में कब्जे के कारण ढाई बिस्वा ही बच गई है। पिछले साल ही इस बात की जानकारी हुई थी। इस मामले में नेपाल सरकार ने भारत सरकार से अनुरोध भी किया था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में स्थानीय प्रशासन को निर्देशित किया था। सीएम के निर्देश पर पहुंचे तत्कालीन कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने जून 2017 में मौके का मुआयना भी किया था। बावजूद इसके अभी तक इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।
इस संदर्भ में दशाश्वमेध जोन के जोनल अधिकारी अरविंद यादव का कहना है कि प्रकरण की जांच चल रही है। जांच पूरी होने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।
नगर निगम के दस्तावेजों में हेरफेर और फर्जी दस्तावेज लगाकर अवैध कब्जेदारों ने पशुपति नाथ मंदिर के एक हिस्से को पिछले कई सालों से कब्जे में ले रखा है। सीएम योगी आदित्यनाथ के दिशा-निर्देश के बाद भी स्थानीय प्रशासन अवैध कब्जे को नहीं हटवा सका है।
साम्राज्येश्वर पशुपति महादेव मंदिर और धर्मशाला कमेटी के गोपाल प्रसाद अधिकारी ने बताया कि नगर निगम ने पशुपति नाथ मंदिर के पूर्व नेपाली पुजारी परशुराम वैद्य का फर्जी मृत्युप्रमाणपत्र जारी कर दिया है।
परशुराम वैद्य की मौत 1947 में नेपाल में हुई थी लेकिन नगर निगम से जारी मृत्यु प्रमाणपत्र में उनकी मौत 2002 में दिखाई गई है। अवैध कब्जेदार ने इसी फर्जी प्रमाणपत्र का सहारा लेते हुए स्वयं को मंदिर के उस हिस्से का कब्जेदार दिखाया है।
नेपाल नरेश ने काशी नरेश से आठ बिस्वा जमीन मंदिर निर्माण के लिए खरीदी थी जो वर्तमान में कब्जे के कारण ढाई बिस्वा ही बच गई है। पिछले साल ही इस बात की जानकारी हुई थी। इस मामले में नेपाल सरकार ने भारत सरकार से अनुरोध भी किया था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में स्थानीय प्रशासन को निर्देशित किया था। सीएम के निर्देश पर पहुंचे तत्कालीन कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने जून 2017 में मौके का मुआयना भी किया था। बावजूद इसके अभी तक इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।
इस संदर्भ में दशाश्वमेध जोन के जोनल अधिकारी अरविंद यादव का कहना है कि प्रकरण की जांच चल रही है। जांच पूरी होने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।