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काशी में पनपेगी ब्रज की ‘सांझी’, होगा अंतरराष्ट्रीय वर्कशाप का आयोजन

Sun, 06 May 2018 04:44 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 06 May 2018 04:44 PM IST
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Saanjhi Kala will be save in kashi interntional workshop
ब्रज में भी सिर्फ श्री राधा रमण मंदिर में ही सांझी बनाई जाती है, लुप्त हो रही कला - फोटो : अमर उजाला
कलानिधि कहे जाने वाले श्रीकृष्ण और उनकी प्रियतमा श्रीराधा को जोड़ने वाली सांझी कला को काशी से जीवंत करने का प्रयास हो रहा है। पांच हजार साल पुरानी विलुप्त हो रही इस कला की परंपरा को काशी में देश और विदेश के कलाकार एक साथ मिलकर नया स्वरूप देंगे।
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ब्रज के सांझी कलाकार सुमित गोस्वामी के निर्देशन और क्रिएटिव फोरम के राजकुमार सिंह के संयुक्त तत्वावधान में काशी में सांझी कला पर जून में अंतरराष्ट्रीय वर्कशाप का आयोजन किया जाएगा। वर्कशाप के माध्यम से लोगों को सांझी कला की बारीकियां और इतिहास से रूबरू कराएंगे।
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क्रिएटिव फोरम के कलाकार राजकुमार सिंह ने बताया कि सांझी देखने में भले ही रंगोली जैसी लगती है, लेकिन इसका महत्व कहीं ज्यादा है। श्रीकृष्ण के प्रति श्री राधा के प्रेम का प्रतिबिंब है सांझी।
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शाम के वक्त श्रीकृष्ण जब राधा से मिलने आया करते थे, वह उन्हें रिझाने के लिए फूलों से तरह-तरह की कलाकृतियां बनाया करती थीं। जब श्रीकृष्ण गोकुल छोड़कर चले गए, तब भी श्रीराधा उनके साथ बिताए गए पलों की याद में इस तरह की कलाकृतियां बनाया करती थीं। यह कला अब लुप्त हो रही है और इसको बढ़ावा देने के लिए काशी से प्रयास किया जा रहा है।

पहले तो यह कला मंदिरों तक सिमटी और अब आलम यह है कि ब्रज में भी श्री राधा रमण मंदिर ही ऐसा है, जहां पर सांझी बनाई जाती है। इस मंदिर के पुजारी वैष्णवाचार्य सुमित गोस्वामी एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जो इस कला को बनाते हैं और इसे बचाने के लिए अपने स्तर पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

क्या है सांझी कला

Saanjhi Kala will be save in kashi interntional workshop
कृष्ण के गोकुल छोड़ने पर उनकी याद में राधारानी बनाया करतीं थीं कलाकृतियां - फोटो : अमर उजाला
सुमित गोस्वामी बताते हैं कि सप्त देवालयों में से एक श्रीराधा रमण मंदिर में पिछले 300 सालों से लगातार यह कला बनाई जा रही है। गोस्वामी का कहना है कि मंदिरों में अब यह कला देखने को नहीं मिल रही। वह अपने स्तर पर भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि यह पुरातन कला आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहे।

ब्रज की इस प्राचीनतम लोककला को बनाए रखने के लिए हम नई पीढ़ी को ट्रेनिंग दे रहे हैं। पानी के ऊपर और तल पर सांझी बनाने के अलावा ऑइल पेंटिंग, लीफ पेंटिंग, मिनिएचर पेंटिंग से लेकर दूसरी पेंटिंग की विधाओं में भी काम कर रहे हैं, ताकि लोगों का ध्यान मूल सांझी कला की तरफ खींच सकें।

सांझी का मतलब है सज्जा, शृंगार या सजावट। मिथकों के अनुसार इस कला की शुरुआत स्वयं श्रीराधा जी ने की थी। मान्यता यह भी है कि सांझी शब्द दरअसल सांझ से बना है, जिसका अर्थ है शाम।

ब्रज में सांझी भी शाम को बनाई जाती है। इस कला का ब्रज से बड़ा गहरा नाता है। साल में एक खास मौके पर ही सांझी बनाई जाती है। माना जाता है कि शुरू-शुरू में तो श्रीराधा अपनी सखियों के साथ दीवारों पर रंगों, रंगीन पत्थरों और धातु के टुकड़ों के साथ सांझी बनाया करती थीं। 

सांझी के प्रकार
1. फूलों की सांझी
2. गोबर सांझी
3. सूखे रंगों की सांझी
4. पानी के नीचे सांझी
5. पानी के ऊपर सांझी

 
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