रामनगर की रामलीला का 8वां दिन: अयोध्या के आंगन में पड़े चार बहुओं के चरण, विदाई के मंचन में हर कोई भाव विभोर
रामनगर की रामलीला के आठवें दिन सातवीं लीला में जनकपुर से बरात विदाई, अवध में परिछन, शयन झांकी की लीला का मंचन हर किसी को भाव विभोर कर गया।
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रामनगर की रामलीला के आठवें दिन गुरुवार शाम सातवीं लीला में जनकपुर से बरात विदाई, अवध में परिछन, शयन झांकी की लीला का मंचन हर किसी को भाव विभोर कर गया। लीला प्रसंग के अनुसार राजा जनक के आग्रह पर महाराज दशरथ चारों युवराजों संग खिचड़ी खाने बैठे। इसमें तरह-तरह के मिष्ठान पकवान व्यंजन परोसे गए तो रघुवर सुनो मधुर स्वर गारियां...खा लो खा लो खिचड़ी मेरे प्यारे लला..,जैसी लोकाचारी गालियां भी गूंजी। इसे सुन सभी निहाल रहे तो महाराज दशरथ ने न्यौछावर देकर रस्म पूरी की।
राजा जनक के आदेश पर सतानंद महाराज ने राजा दशरथ को युवराज समेत खिचड़ी खाने को आमंत्रित करते हैं। मंडप में पहुंचने पर सभी का पांव धुलाकर आसन ग्रहण कराया गया। महाराज दशरथ द्वारा अयोध्या जाने की बात सुनकर राजा जनक उन्हें रोकते हैं। गुरु विश्वामित्र व सतानंद राजा जनक को समझाते हैं। सखियां सीता को सेवा धर्म की सीख देती हैं। राम सहित चारों भाई सास महारानी सुनयना का आशीर्वाद लेते हैं। भावुक राजा जनक दूर तक बरात विदा करने आते हैं। सभी उन्हें समझाकर वापस भेजते हैं।
शुभ मुहूर्त में बरात अयोध्या में प्रवेश करती है। युवराजों के साथ ही चार-चार बहुएं आने की खुशी में अयोध्या आनंद से सराबोर हो जाती है। महारानी कौशल्या, कैकेयी व सुमित्रा हर्षित नवयुगुलों का परिछन कर आरती उतारती हैं। विश्वामित्र के विदा मांगने पर महाराज दशरथ खुद के साथ ही पुत्रों पर भी स्नेह रखते हुए सदैव दर्शन देने को कृपा मांगते हुए उनके चरणों पर गिर पड़ते हैं। विश्वामित्र आशीर्वाद प्रदान कर अपने आश्रम लौट जाते हैं।
कैकेयी ने डाला खलल, वन को चले श्रीराम
जाल्हूपुर के टूड़ी नगर की रामलीला में गुरुवार को राज्याभिषेक और कैकेयी के कोपभवन की लीला हुई। प्रसंगानुसार राजा दशरथ राम को अयोध्या का उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लेते हैं। राम के राजतिलक की तैयारी शुरू होती है। यह देखकर देवताओं में खलबली मच जाती है। सभी देवता आनन-फानन में मां सरस्वती के पास पहुंचकर उनसे निवेदन करते हैं कि कुछ ऐसा उपाय करें, जिससे राम राजपाट छोड़कर वन चले जाएं। वे जिस कार्य के लिए धरती पर अवतार लिए हैं वह पूरा हो सके।
देवताओं की बात सुनकर माता सरस्वती कैकेयी की दासी मंथरा की बुद्धि फेर देती हैं। मंथरा कैकेयी को ऐसा गुमराह करती है कि वह कोपभवन में पहुंच जाती हैं। राजा दशरथ उन्हें मनाने जाते हैं। कैकेयी उन्हें वरदान की बात याद कराते हुए राम को 14 वर्ष का वनवास व भरत को राजगद्दी की मांग करती हैं। यह सुनकर राजा दशरथ जमीन पर गिर पड़ते हैं। इसके बाद श्रीराम सहर्ष वन जाने को तैयार हो जाते हैं। आरती के बाद रामलीला समाप्त हो जाती है।