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थिएटर ओलंपिक के लिए ‘पूर्वा बनारस’ के इस नाटक का हुआ चयन
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Wed, 13 Dec 2017 03:00 PM IST
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रूपवाणी थिएटर में फुल ड्रेस रिहर्सल में कलाकारों ने जीता दिल
- फोटो : अमर उजाला
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थिएटर ओलंपिक 2018 में बनारस की नवोदित नाट्य संस्था पूर्वा बनारस के नाटक का चयन हुआ है। इस नाटक का फुल ड्रेस रिहर्सल किया गया।
को न हासो किमानंदो निच्चं पज्जलिते सति/ अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेसथ...। धम्म पद में वर्णित बुद्ध की इस पुकार से बनारस की नवोदित नाट्य संस्था पूर्वा बनारस के नाटक ‘बुद्ध मुक्ति देने नहीं’ की शुरुआत होती है।
फरवरी में शुरू हो रहे आठवें थिएटर ओलंपिक में देश की पहली नवोदित नाट्य संस्था के रूप में पूर्वा बनारस के इस नाटक का चयन किया गया है। इसके लिए मंगलवार को लोहटिया स्थित रूपवाणी थिएटर में फुल ड्रेस रिहर्सल आरंभ हुआ। कलाकारों ने बुद्ध की ज्ञान मुद्राओं से लेकर उनकी करुणा और प्रेम को अभिनय के जरिए जीवंत किया तो तालियां गूंजने लगीं।
नाटक के फुल ड्रेस रिहर्सल की शुरुआत पहले दृश्य में ध्वज स्थापना से होती है। मोहक रंग विन्यास और कलाकारों की रूप सज्जा बरबस ध्यान खींचती है। एक द्वार खुलता है और कविता गूंजने लगती है- बुद्ध मुक्ति देने नहीं...।
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बुद्ध के जीवन मूल्यों को प्रदर्शित करने के लिए खास भाव-भंगिमाओं का सहारा लिया जाता है। कविता की आखिरी पंक्ति इस नाटक के जरिए बड़ी अपील करती है। तुम्हें मुक्ति देने नहीं, दीप बनाने लौटेगा/तुम सुनना उसकी आवाज/खुले रखना अपने द्वार...।
इस नाटक में धीरेंद्र मोहन ने कला अभिरुचियों का खास ख्याल रखा है। बनारस की संगीत परंपरा के साथ विशिष्ट जीवन शैली का पुट इसे जीवंत बनाता है।
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को न हासो किमानंदो निच्चं पज्जलिते सति/ अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेसथ...। धम्म पद में वर्णित बुद्ध की इस पुकार से बनारस की नवोदित नाट्य संस्था पूर्वा बनारस के नाटक ‘बुद्ध मुक्ति देने नहीं’ की शुरुआत होती है।
फरवरी में शुरू हो रहे आठवें थिएटर ओलंपिक में देश की पहली नवोदित नाट्य संस्था के रूप में पूर्वा बनारस के इस नाटक का चयन किया गया है। इसके लिए मंगलवार को लोहटिया स्थित रूपवाणी थिएटर में फुल ड्रेस रिहर्सल आरंभ हुआ। कलाकारों ने बुद्ध की ज्ञान मुद्राओं से लेकर उनकी करुणा और प्रेम को अभिनय के जरिए जीवंत किया तो तालियां गूंजने लगीं।
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नाटक के फुल ड्रेस रिहर्सल की शुरुआत पहले दृश्य में ध्वज स्थापना से होती है। मोहक रंग विन्यास और कलाकारों की रूप सज्जा बरबस ध्यान खींचती है। एक द्वार खुलता है और कविता गूंजने लगती है- बुद्ध मुक्ति देने नहीं...।
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बुद्ध के जीवन मूल्यों को प्रदर्शित करने के लिए खास भाव-भंगिमाओं का सहारा लिया जाता है। कविता की आखिरी पंक्ति इस नाटक के जरिए बड़ी अपील करती है। तुम्हें मुक्ति देने नहीं, दीप बनाने लौटेगा/तुम सुनना उसकी आवाज/खुले रखना अपने द्वार...।
इस नाटक में धीरेंद्र मोहन ने कला अभिरुचियों का खास ख्याल रखा है। बनारस की संगीत परंपरा के साथ विशिष्ट जीवन शैली का पुट इसे जीवंत बनाता है।