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नेपाल के राजा ने काशी में बनवाया था अपने देश जैसा शिवालय, दिया गया है पशुपतिनाथ का दर्जा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Wed, 24 Jul 2019 03:34 PM IST
ललिता घाट पर स्थित भगवान पशुपति नाथ का मंदिर
ललिता घाट पर स्थित भगवान पशुपति नाथ का मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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वाराणसी के जलासेन घाट के बगल में ललिता घाट पर स्थित भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपालियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के प्रतिरूप इस मंदिर में प्रवेश करते ही नेपाल का एहसास होता है। यह मंदिर नेपाली मंदिर के नाम से भी मशहूर है। इसके संरक्षण का काम भी नेपाल सरकार ही करती है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर में दर्शन-पूजन का फल नेपाल के पशुपति नाथ के दर्शन-पूजन के समान ही मिलता है।



काशी जहां मां गंगा के तट पर बसी है तो वहीं काठमांडू शहर बागमती नदी के किनारे विकसित हुआ। काशी में स्थित पशुपतिनाथ के मंदिर की नक्काशी और नेपाल के मंदिर की नक्काशी भी हूबहू है। इसके अलावा दोनों मंदिरों की भव्यता भी एक जैसी ही है।


काशी और नेपाल के पशुपति नाथ के मंदिर में पूजापाठ भी नेपाली समुदाय के लोग ही करते हैं वो भी बिल्कुल एक जैसी परंपरा के अनुसार। ललिता घाट स्थित यह मंदिर काशी के अन्य शिव मंदिरों से बिल्कुल अलग है। मंदिर के भीतर गर्भगृह में पशुपति नाथ के रूप में शिवलिंग स्थापित है।

नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने करवाया था निर्माण

पशुपति नाथ के रूप में स्थापित शिवलिंग
पशुपति नाथ के रूप में स्थापित शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला
मंदिर के प्रबंधक रोहित ने बताया कि पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राणा बहादुर साहा ने करवाया था। वाराणसी में मंदिर निर्माण के उद्देश्य से वो काशी आए और प्रवास किया। प्रवास के दौरान पूजा पाठ के लिए उन्होंने काशी में शिव मंदिर बनवाने का निर्णय लिया, वो भी नेपाल के वास्तु और शिल्प के अनुसार। गंगा किनारे घाट की भूमि इस मंदिर के निर्माण के लिए चुनी और इसका निर्माण शुरू कराया इसी दौरान 1806 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके बेटे राजा राजेंद्र वीर विक्रम साहा ने इस मंदिर का निर्माण 1843 में पूरा कराया।

नेपाल से मंगाई गई थी लकड़ी

पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मंदिर का निर्माण नेपाल से आए कारीगरों ने किया था। मंदिर निर्माण में प्रयोग की गई लकड़ी को भी राजा ने नेपाल से ही मंगवाया था। इस काठवाले मंदिर को छोटा खजुराहो भी कहा जाता है। हालांकि यह रचना लकड़ी की बनी हुई है फिर भी यह दीमक मुक्त है।
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