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Varanasi News: कभी सन्यासी बनना चाहते थे, नियति ने बना दिया महाकवि

Mon, 30 Jan 2023 07:00 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 30 Jan 2023 07:00 AM IST
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Once wanted to become a monk, destiny made him a great poet
हिंदी साहित्य के यशस्वी सूर्य महाकवि जयशंकर प्रसाद ने छायावाद को नया स्वरूप दिया। पुण्य भूमि काशी में जन्मे महाकवि ने मार्मिक रोचक, सुंदर और उदात्त साहित्य लिखा, जिससे साहित्य में छायावाद युग का आरंभ हुआ। यह जीवन यात्रा इतनी सरल नहीं थी। महाकवि जयशंकर कभी सन्यासी बनने के लिए घरबार छोड़कर निकल गए थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। घर वाले उन्हें खोजकर लाए और उन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन स्वीकार किया। इसमें कहीं ना कहीं उनकी भाभी की प्रेरणा और योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।
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महाकवि की प्रपौत्री कविता ने बताया कि हिंदी साहित्य में मानस के बाद अगर किसी ग्रंथ की मीमांसा हुई है तो जयशंकर प्रसाद रचित कामायनी की। भारतीय साहित्य में उनके प्रभाव के बारे में विद्वान डेविड रुबिन ने ‘द रिटर्न ऑफ सरस्वती’ (ऑक्सफोर्ड, 1993) में लिखा है, खडी बोली हिंदी में एक वास्तविक काव्य कला के विकास में पहली सफल छलांग लगाने का श्रेय जयशंकर प्रसाद को है। पहली और दूसरी पत्नी के निधन के बाद परदादा जी जयशंकर प्रसाद ने घर बार छोड़ दिया। परिवार के सदस्यों ने जब खोजा तो वह विंध्यवासिनी मंदिर में मिले। भाभी लखरानी देवी के आदेश पर वह घर लौटे मगर सन्यास की जिद नहीं छोड़ी। भाभी के आदेश पर उन्होंने किसी तरह तीसरी शादी की और उसके बाद मेरे दादाजी रत्नशंकर हुए।
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चार बजे भोर में जन्मे और भोर में ही हुआ निधन
जयशंकर प्रसाद पर स्वतंत्र रूप से शोध कर रहे नित्यानन्द राय बताते हैं कि जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 को प्रसाद मंदिर गोवर्धन सराय में सुबह चार बजे हुआ था। उनका निधन 15 नवंबर 1937 को ठीक चार बजे भोर में ही हुआ। ऐसा संयोग बहुत कम मिलता है कि जब किसी महापुरुष का जन्म और मृत्यु एक ही समय पर हो। परिवार के झगड़े में कामायनी तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में पहुंच गई, लेकिन उनकी कई स्मृतियां बक्शे मे बंद खराब हो रही हैं या खराब हो चुकी होंगी।
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